Saturday, October 10, 2020

संतोष प्रधान "कचंदा" की रचना- जीवन चक्र

नाम-    संतोष प्रधान "कचंदा"
स्थान-  कचंदा
जिला-  जांजगीर-चांपा/ छत्तीसगढ़
विधा- गीत
शीर्षक- जीवन चक्र

                जीवन चक्र

जिंदगी ने मेरे साथ, कैसा खेल खेला ।
शिखर में ले जाकर,  वहाँ  से ढकेला।।

टूट   गयी    आशाएं , हो गया निराश ,
थम गए  कदम ,     रूक गया विकास ,
साथ मेरा कोई नहीं , रह गया अकेला ।
जिंदगी ने मेरे साथ, कैसा खेल खेला ।।

खाने-पीने   हेतु नहीं है भोजन-पानी.
क्या सुनाऊँ मेरे इस जीवन की कहानी ,
यह जीवन अब नहीं जाता और ठेला ।
जिंदगी ने मेरे साथ कैसा खेल खेला ।।

गम के साये  में   कटती है दिन-रात,
सोचता हूँ  हमेशा  बस  एक ही बात ,
कब आयेगा जीवन में पहले जैसी बेला ।
जिंदगी ने मेरे साथ कैसा खेल खेला ।।

आखिर दूर हुआ दुर्दिन, लौट आया बहार ,
बहने लगी जीवन में खुशियों की बयार ,
साथ सभी आ गए अब न रहा अकेला।
जिंदगी ने मेरे साथ, कैसा खेल खेला ।।

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