स्थान- कचंदा
जिला- जांजगीर-चांपा/ छत्तीसगढ़
विधा- गीत
शीर्षक- जीवन चक्र
जीवन चक्र
जिंदगी ने मेरे साथ, कैसा खेल खेला ।
शिखर में ले जाकर, वहाँ से ढकेला।।
टूट गयी आशाएं , हो गया निराश ,
थम गए कदम , रूक गया विकास ,
साथ मेरा कोई नहीं , रह गया अकेला ।
जिंदगी ने मेरे साथ, कैसा खेल खेला ।।
खाने-पीने हेतु नहीं है भोजन-पानी.
क्या सुनाऊँ मेरे इस जीवन की कहानी ,
यह जीवन अब नहीं जाता और ठेला ।
जिंदगी ने मेरे साथ कैसा खेल खेला ।।
गम के साये में कटती है दिन-रात,
सोचता हूँ हमेशा बस एक ही बात ,
कब आयेगा जीवन में पहले जैसी बेला ।
जिंदगी ने मेरे साथ कैसा खेल खेला ।।
आखिर दूर हुआ दुर्दिन, लौट आया बहार ,
बहने लगी जीवन में खुशियों की बयार ,
साथ सभी आ गए अब न रहा अकेला।
जिंदगी ने मेरे साथ, कैसा खेल खेला ।।
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