स्थान- कचंदा
जिला- जांजगीर-चांपा/ छत्तीसगढ़
विधा- कविता
शीर्षक- शांति बनी रहे
शांति बनी रहे
अत्याचार भ्रष्टाचार, चहुँ ओर है फैला ।
दिन दुनी ,रात चौगुनी, बढ़ रहा ये मैला ।
बढ़ रहा ये मैला , फैलाता अपनी जाल ।
आओ इसे नष्ट करें ,बनकर इसका काल ।
कह "प्रधान" कविराय, करें प्रबल प्रहार ।
न रहे अत्यचारी, न हो कभी अत्याचार।
भयमुक्त जीवन हो , सुखमय रहे सारा जहान ।
विश्वशांति की बहे बयार ,ऐसा जीवन दे भगवान।
ऐसा जीवन दे भगवान, अत्याचार न हो कभी ।
प्रेमभाव भाईचारे से , सम्पन्न हो जन सभी ।
कह "प्रधान" कविराय , सबका जीवन हो सुखमय ।
विश्वशांति बनी रहे , नष्ट हो सबका दुःखभय ।
न खड्ग की धार , न गोलियों की बौछार ।
बैर भाव खत्म हो , बने आपस में प्यार ।
बने आपस में प्यार , प्रेम ही हो जग में ।
तन तरंग हो , मन उमंग हो ,प्रेम ही बहे रग में ।
कह "प्रधान" कविराय , दूर करें मन के विकार ।
प्रेम ज्योत जलायें , दूर करें जग की अंधियार ।
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