Thursday, October 1, 2020

मोनालिसा बेहरा की रचना- अहिंसा

रचियता- श्रीमती मोनालिसा बेहरा
रायगढ़, छत्तीसगढ़
विधा-मुक्त छंद काव्य
विषय- अहिंसा ( कारणमाला अलंकार)
शीर्षक- अहिंसा के बदले हिंसा

बापू तेरे देश मे,हिंसा का ही साम्राज्य
वैमनस्य ही छाया है, देश हो चाहे राज्य

भूल चुके सब जो तुमने सिखाये पाठ थे
सत्य ,अहिंसा और शांति पन्नो में ही सिमटे

मानवता सब भूल चुके,दरिंदगी चहुँ ओर है छाया
कुंडली जमाये बैठी है ,सत्ता ,पद और माया

गिध्दों की तरह नोंच रहे सब हाड़-मांस का काया
कुंठित है आज हर बेटी  पर पुरुषार्थ ना शर्माया

मंदिर में कैसे आएं राम,खेतों में जल रही सीता
सरलता,सहजता खो चुके हम मानवता है मिटा

न्याय का कहीं नाम नही,अन्याय का बोलबाला है
खेतों में बिखरी है राख  चूँकि गिध्द रसुखवाला है

येन - केन -प्रकारेण साक्ष्य मिटाने सब आतुर हैं
चित्कार उसकी दबा चुके,परिजन सब व्याकुल हैं

आवाम है आज चीख रही, न्याय की गुहार है
दबा दी जाएगी ये भी,होता यही हर बार है

बापू आज तुम होते तो जन्मदिन अपना कैसे मनाते
अहिंसा के बदले हिंसा देख अपने देश पे नाज ना कर पाते।

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