पेंडरवानी , बालोद, छत्तीसगढ़
विधा - कविता (मुक्त छंद)
अलंकार- कारणमाला अलंकार
शीर्षक- अहिंसा के रास्ते ...
अहिंसा के रास्ते ...
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सत्य अहिंसा भाईचारा ,
मानवता की पहचान ,
मानवता मानव में नही ,
फिर काहे का अभिमान ?
अहिंसा से प्रेम बढ़े ,
प्रेम से इंसान विनम्र होए ,
विनम्रता धीरज बढ़ाता ,
इससे क्रोध विकार सब खोए ,
क्या रखा है खून-खराबे में,
जब समाधान हो बातों में ,
हिंसा विचलित करता मन को,
फिर नींद न आती रातों में ,
अहिंसा में क्षमा छिपा ,
क्षमा मानवता का मूल ,
जब सब समर्पण कर जाए ,
तब क्या मोल भया त्रिशूल ,
दया दिखाते प्राणी मात्र में ,
अहिंसक जग का दास बन जाता,
हृदय जीतकर दूजे का ,
सबका वो विश्वास बन जाता ,
सत्य अहिंसा का मार्ग कठिन ,
आजन्म सत्यकाज करना होता,
लांक्षण सहते , निंदा सहते ,
समदर्शी बन रहना होता ,
खोने का क्या गम होगा ?
जब पाने की ही चाह नही ,
फिर अपना - पराया एक सा ,
ईश्वर के पथ का यही राह सही ,
( गाली बकने वालों को स्मित मुस्कान देना आसान काम नही,पर इसी रास्ते एक दिन हम औरों को भी अपना बना लेते हैं।)
- - शैलेन्द्र चेलक - -
Bahut khub sir jiii
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