Monday, October 19, 2020

रायगढ़ से अजय पटनायक की रचना- ओस की बूंदें

रचनाकार- अजय पटनायक
जिला- रायगढ़,छत्तीसगढ़
विधा- मुक्त
विषय- ओस की बूंदें

 
     ओस की बूंद

ये चाँद चले आना धरा में,चंचल चांदनी बिखर रही है।
सोलह कलाएं सुशोभित हो रही,कली बन कुसुम बागों में निखर रही है।।

चाँदनी सर्द रात हो गई ,ओस सिप की आस में खो गई ।
चली हवा शिशिर की,अवनि में बरसात हो गई।।

 तुम कब आओगे सखा,मन आतुर सिहर रही है।
ये चाँद चले आना धरा में,चंचल चांदनी बिखर रही है।।

 ओस की बूंदे अमृत बरसाये, तेरी याद में जिया अकुलाये।
 बदल रहे जर यौवन में,पल-पल हृदय को हर्षाये।।

 शीतल उज्जवल निश प्रेम की ,फिर क्यों बिहर रही है।
 ये चांद चले आना धरा में,चंचल चांदनी बिखर रही है।।

 मृगतृष्णा की प्यास लगी है,तेरे आने की आस लगी है।
 बीत ना जाए ये ऋतु शरद की ,सुहानी रात अब खास लगी है।।

चकोर वन में भटक रहा,क्यों तुम घुम पीहर रही है।
ये चाँद चले आना धरा में,चंचल चांदनी बिखर रही है।। 

ओढ़ ली धरती हिम की चादर,कोमल पल्लव झूम रहें है।
झुकती डाली लगे मनभावन,देख धरा को चूम
 रही है।।

सागर में खो जाये ना मोती,क्यो ढूंढ दीगर रही है।
ये चाँद चले आना धरा में,चंचल चाँदनी बिखर रही है।।

           मौलिक रचना
          अजय पटनायक

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