स्थान-बनाई तमनार, रायगढ़
विधा- कविता
शीर्षक -"ओस की बूंद "
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घनेरे कोहरे लेकर के
शीतल बयार है आई
ओस की बूंदों के दस्तक से
फजाएँ खूबसूरत हो आईं
अल्हड़ सी ओस की बूंदें
पड़े तृण मौर पर तो लगे
आसमान के सारे सितारे
मानो धरा धर लाई
तिनके - तिनके खिल उठे
जब खिल उठी तरुणाई
सुनहरी आरुणि जब छाई
ओस की बूंदों ने ली अंगड़ाई
घने कोहरे की परछाई से
दिख रहीं हो दिया सलाई
कभी कोहरे ओढ़ना ओढ़े
प्रकृति भी लगे शरमाई
डाली पत्तों पर जब पड़ी
तो मोती- मोती जुड़ सजी
खूबसूरती छूने जब हाथ बढ़े
पल में जाने कहाँ गुम हुई ।
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