निवासी-बायरन बाज़ार,रायपुर ।
जिला- रायपुर ,छत्तीसगढ़ ।
विषय-^^^ओस की बूँद ^^^।
शीर्षक-"""ओस की बूँद """" ।
विधा--छ्न्द मुक्त कविता ।
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====||•ओस की बूँद •||=====
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मैं पानी की एक बूँद हूँ---
निशा में टपकी,
प्रभात में,मैं एक'ओस की बूँद' हूँ ।
मैं,एक मामूली- सी ---
'ओस की बूँद ' हूँ ,
परिंदों की,प्यास बुझाने में---
खुद को,फना कर दूँगी --।
मुझको,तुम सिर्फ पानी की----
बूँद ही ,ना समझो ---?
मैं तो,परिंदों की प्यास क्या ---?
हर इन्सा की भी,
प्यास बुझाने में,
उतनी ही,सक्षम हूँ--।
जब,मैं,धरा में,रहती हूँ तो---
होती है,भरपूर चहुँओर हरियाली--
और दिखे सबके---
चेहरों में,ढेरों खुशहाली--।
अक्सर मैं बन जाऊँ -----
भोर की,शीतलमय ताजगी--
और कभी,मोतियाबिंद-रोगी--
के लिए,दवा व इक रोशनी--।
मैं,वही पानी की---
पावन-निर्मल,एक बूँद हूँ--
मैं,वही,एक 'ओस की बूँद' हूँ--।
मैं,कवि ,गजलकार की कल्पना में--
एक खूबसूरत शबनम का एहसास हूँ,
मैं,निशा में टपकी----
वही,''ओस की बूँद '' हूँ ।
मेरा जीवन ,होता कितना सुहाना---
जब-जब,होता ,शीत ऋतु का महीना,
हर दरख्तों की शाख,पत्तियों में,
धरा में फैले,घास-पूस में,टपकना,
फिर,प्रात: मोती -सा दमकना--।
जरा सुन भी लो ,इतना-सा---
मैं, ''एक-ओस की बूँद--
अपनी ख़ुशी की,आगोश में--
तुमको,भर लेना चाहती हूँ--?
मेरी,प्यास,अब भी,अधूरी है---
मेरी मन की आश को--
आज,तुमको,पूरी करनी है--।
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व्याख्या:-उपरोक्त रचना के माध्यम से यह कहना चाहता हूँ कि "ओस की बूँद " पानी का एक बूँद होते हुए भी प्रकृति की अनमोल धरोहर है और मानव व प्रकृति के बीच सामजस्य बना सदैव ही खुशियाँ ही बिखरते रहती है ।
÷÷÷÷स्वरचित-प्रस्तुति ÷÷÷÷÷÷÷÷
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