स्थान-नवापाराखुर्द/सक्ती
जिला -जांजगीर-चांपा/ छत्तीसगढ
विधा-कविता-मुक्त
विषय-भावना
शीर्षक-- एक दीप
एक दीप जलाकर सारे जग का, चाहूं मैं अंधकार मिटाना ।
तुम भी अगर ऐसा चाहते हो,तो दीपक अपना जलाना ।
दीपक मत खोजो मन भाव रखो ।
मन में इसका न तनाव रखो ।
लगे जगमगा रहा दीपक अपना ।
दीपक का तुम प्रभाव रखो ।
पड़ता है पड़ जाने दो रखने का ,उसका विशद निशाना ।
जब ऐसे दीप जलने लगे हाथ ।
गिनना फिर कितने ऐसे हैं हाथ ।
देखना अंधेरा फिर आसपास ।
तुम्हें हो जायेगा खुद विश्वास ।
तुम जान जाओगे कब तक है जलाना और बुझाना ।
एक तो मन एक दीप मेरा ।
यही पर दो- दो हो गये ।
और किसी का साथ मिले ।
वह भी मालूम हो गये ।
यह लक्ष्य नहीं महालक्ष्य है इसे मंजिल तक है पहुंचाना ।
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