जिला-रायगढ़ (छत्तीसगढ़)
विधा-तद्गुण अलंकार
विषय- मोह
शीर्षक- "मोह का बंधन"
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व्यथित भाव चित्कार से,
शोषित भाव की गुहार से ।
उद्वीग्नता पुकारती....
मैनाक गिरी अब तुच्छ शिखर,
मगन मन मैनाक सर्वोच्च प्रखर ।।
गगन आज निहारती....
रिश्तो का समंदर असीम अथाह,
हर्षित भाव में ही छुपा कराह ।
वेदना ही गुहारती.....
लोभ-मोह और काम-क्रोध,
कवच भीरुता का सदा अबोध ।।
शौर्य वीर्य धिक्कारती....
झूठे जगत का युद्ध अजीब,
हार मौत के होत करीब ।
सत्य नित्य निवारती .......
अज्ञान जीव की मृत्यु दुर्दशा,
मोह गिद्ध सी मंडराती हमेशा ।।
सुज्ञान शरीर सॅंवारती......
उद्वीग्नता पुकारती..........
सत्य नित्य निवारती .......
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स्वरचित मौलिक रचना-
गुलशन खम्हारी "प्रद्युम्न"
रायगढ़ (छत्तीसगढ़)
बहुत-बहुत आभार 🙏🙏
ReplyDeleteNice
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