स्थान- कचंदा
जिला- जांजगीर-चांपा/ छत्तीसगढ़
विधा- कविता
शीर्षक- मोह का प्रभाव
मोह का प्रभाव
जीवन पर पड़ता है, मोह का बड़ा प्रभाव।
बिन मोह के आदमी को, प्रेम का अभाव ।
प्रेम का अभाव, नहीं किसी पर लगाव ।
घर-परिवार, दुनियादारी न कभी तनाव ।
कह "प्रधान" कविराय, मुक्त उनका मन ।
कैसे कोई जी पाएं, बिन मोह का जीवन ।
तन-मन-धन का , सबका अपना मोह ।
इसको पाने सबको, लेना पड़ता लोह ।
लेना पड़ता लोह, फंसाना पड़ता चाल में ।
बिन इसके उन्नति, होती नहीं हर हाल में।
कह "प्रधान" कविराय, ऐसा होता है मन ।
मोह-माया के ज्वाला में जले सारा तन ।
No comments:
Post a Comment