जिला - बलौदाबाजार (छ. ग.)
शीर्षक - "मोह-माया "
विधा - छंदमुक्त कविता
अलंकार - तद्गुण अलंकार
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मोह-माया रुपी यह संसार,
नहीं जीवन का ये आधार।
करना है भव से सागर पार,
प्रभु भक्ति ही है आधार।।
जीवन का बदलता रुप,
मोह में ही टिकी संसार है।
ध्यान करले तू उस शक्ति का,
जो निर्गुण निराकार है।।
मोह कैसा तन से ये तेरा,
मिट्टी में एक दिन मिल जायेगा।
जिसे कहता तू अपना हितैषी,
कोई काम न आयेगा।।
मोह में पड़कर पुत्र के,
कैकयी ने राम को वनवास दिया।
मोह त्याग राज पाठ का लक्ष्मण,
प्रभु राम चरणों में वास किया।।
काम, क्रोध ,लोभ, मोह
जीवन में करते नुकसान हैं।
त्याग करते जो इन दुर्गुणों का,
कहलाते वही महान है।।
वासना की चाह में तुने,
नारी से दुर्व्यवहार किया।
अस्मत से खेलकर तूने उसकी,
जीना उसका दुस्वार किया।।
राम रुपी चेहरे लेकर,
रावण सा कार्य क्यों करता है।
मोह के वश में तू आकर,
पर-स्त्री हरण क्यों करता है।।
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तद्गुण अलंकार का प्रयोग -
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1. मोह माया रुपी यह संसार।
2. जीवन का बदलता रुप।
3. राम रुपी चेहरे लेकर।
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मौलिक रचना (स्वरचित)
संतराम कुम्हार
बलौदाबाजार (छ.ग.)
Bahut sundar
ReplyDeleteCorrect 👍👍
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