Thursday, October 15, 2020

बलौदाबाजार से संतराम कुम्हार की रचना- प्रकृति और जलप्रपात

रचनाकार -  संतराम कुम्हार
   जिला -  बलौदाबाजार (छ. ग.)
     विधा - छंदमुक्त कविता
   शीर्षक - " प्रकृति और जलप्रपात "
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प्रकृति की छटा बहुत निराली,
पर्वतों के बीच सूरज की लाली।
सुन्दर मनोरम फूलों की डाली,
कुक-कुक करती कोयल काली।।

बर्फ की चादर ओढ़े हुए,
श्वेत किरण से चमकती है।
ऊष्मा से मोम-सा पिघल-पिघल कर,
बनके झरना ओ बहती है।।

प्रकृति की प्यारी गोद में,
फूलों की घाटी हंसती है।
आलिंगन करती एक-दूजे से,
पुष्प मुस्कान बिखेरती है।।

घने-घने जंगल की कतारें,
वन्य-प्राणियों का वास है।
प्राण वायु का जन्मदाता,
मानव का आधार श्वास है।।

धरती सजी जैसे दुल्हन,
प्रकृति ही उसका श्रृंगार है।
मुकुट बना हिमालय की चोटी,
झरनों की जलधारा ही गले का हार है।।

जल की विभिन्न धाराओं से,
जलप्रपात बन जब गिरती है।
मोह लेती मन ध्वनि सुमधुर,
गीत संगीत सा ओ बजती है।।

दूध-सी धारा जलप्रपात की,
सबसे कुछ ओ कहती है।
बढ़ते रहना कभी न ठहरना,
परोपकार काज भी करती है।। 
                                 
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मौलिक रचना (स्वरचित)
संतराम कुम्हार
बलौदाबाजार (छ.ग.)


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