Saturday, October 24, 2020

उर्मिला सिदार कृत निबंध- पत्र लेखन का महत्व

रचनाकार -उर्मिला सिदार
ग्राम- बुलाँकी 
जिला- रायगढ़(छत्तीसगढ़ )
विषय -स्कूली पाठ्यक्रम में पत्र लेखन का समावेश
शीर्षक -"पत्र लेखन का महत्व"
विधा -निबंध
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      *पत्र लेखन का महत्व*
 पत्र लेखन संचार का एक महत्वपूर्ण अंग है। जो लिखित रूप में होता है ।जहाँं श्रवण माध्यम से संदेश पहुंचाने में बाधाएं आती है ।वहां सूचनाओं को या संदेशों को पत्र के माध्यम से ,भावों को अवगत कराया जाता है। पत्र में जो भावनाओं का वर्णन किया जाता है, वह बहुत कम शब्दों में सारगर्भित होना चाहिए। वर्तमान युग में टेक्नोलॉजी की दुनियाँ में सूचना पहुंचाने का विभिन्न स्वरूपों का अविष्कार हो चुका है। पत्र लेखन उसी संचार माध्यमों का एक विशेष महत्वपूर्ण योगदान देने वाली सफल और स्पष्ट संदेश लिखित स्वरूप में प्रमाणित का बोध कराता है। अगर किसी बात को बोल कर  संदेश पहुंचाते हैं ,
तो भाषा या ध्वनि या शब्दों का अर्थ स्पष्ट न हो तो या अन्य त्रुटियांँ हो तो  अर्थ का अनर्थ घटनाएँं ,होने की संभावना रहती है ।लेकिन पत्र लेखन में वैसा नहीं होता। पत्र में जो बात स्पष्ट लिखी जाती है। वह प्रमाण स्वरूप में मौजूद रहता है। पत्र लेखन एक औपचारिक और  एक अनौपचारिक लिखे जाते हैं ।  औपचारिक के अंतर्गत  कार्यालय कामकाज संबंधी लिखा जाता है। और दूसरा है,अनौपचारिक,जो संबंधों के लिए पत्र लेखन किया जाता है। औपचारिक और अनौपचारिक दोनों पत्रों के लेखन विधियाँ होती है। अगर पत्र लेखन सुस्पष्ट और भावात्मक है ,तो पत्र पढ़ने वाला व्यक्ति जरूर प्रभावित होता है और उस पत्र पर ध्यान देता है।
        पत्र लेखन में निम्न बातों पर ध्यान देने की आवश्यकता होती है ।
पहला -जिसके प्रति पत्र लेखन हो उसके प्रति संबोधन शिष्टाचार व्यवहार हो।
 दूसरा -पत्र लेखन में जो भाव का संदेश है ,वह भाव से स्पष्ट होना चाहिए।
तीसरा- पत्र लेखन की भाषा, सरल, सहज, भावात्मक और स्पष्ट होना चाहिए।क्लिष्ट भाषा का प्रयोग ना हो।
  चौथा -पत्र में उल्लेख की गई बातें सार्थक और सारगर्भित हो, जो पाठक को प्रभावित करें। निरर्थक एवं  सारगर्भित ना हो तो उलझन या समस्या पैदा होती है।
 पांचवा -पत्र के अंतिम व्यवहारिक नम्रता पूर्ण संबोधन हो।
            इस तरह पत्र लेखन करते समय उपरोक्त बातों पर ध्यान देने की आवश्यकता है।  औपचारिक पत्र में संबोधन एवं अनौपचारिक में बड़ों के प्रति, पूज्य  श्रद्धा  आदरणीय एवं छोटों के प्रति प्यार, स्नेह भाव दर्शाया जाता है। अंतिम में संबधों को पहचान कर, उनके प्रति जो संबोधन उचित लगे जैसे ,धन्यवाद ,शुभचिंतक आज्ञाकारी आदि दर्शाया  जाता है। अगर पत्र लेखन से स्पष्ट भावात्मक और सार्थकता के अर्थ में लिखी जाती है ,तो जरूर पत्र लेखन की प्रशंसा और उस पर लेखन में लिखी गई बातों पर ध्यान देकर उस सूचनाओं के प्रति प्रभावित होकर उसे समाधान देने की कोशिश की जाती हैं।
                        धन्यवाद

                उर्मिला सिदार 
             रायगढ़ छत्तीसगढ़

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