पता :- तमनार ,रायगढ़ (छत्तीसगढ़ )
वर्तमान पता :- सम्बलपुर ओड़िशा
विधा :- कविता (मुक्त छंद )
विषय :- दार्शनिक
शीर्षक :- मुझमें खोया ये जहान सारा
मुझमें खोया है ये जहां सारा
मुझसे ही है दुनिया में अंधेरा और उजियारा
इस जग के कण-कण में मैं हूं
मेरे भीतर समाहित है ये जहान सारा
सबेरा सूरज भी मेरा है ।
चिड़ियों का बसेरा भी मेरा है ।
कोयल की कुक भी मेरी है ।
प्यारी सी धूप भी मेरी है ।
हर मानव मेरी बनाई सूरत है ।
जिसके मन में मेरी मूरत है ।
ये लहरें हैं मैं इनका किनारा ।
मुझमें खोया है ये जहान सारा ।
मां कि दुलार में,
पिता के फटकार में,
पिया के प्यार में,
और प्रियशी के श्रृंगार में
मैं ही तो हूं हर आकार में ।
मैंने ही तो हर रिश्ते को प्रेम से संवारा ।
मुझमें खोया है ये जहान सारा ।
सीता का राम भी मैं हूं ।
राधा का श्याम भी मैं हूं ।
सिरडी का साईं भी मैं हूं ।
बुद्ध की परछाई भी मैं हूं ।
हर भावना, हर कल्पना और हर आभाव में
मैं रहता हूं सबके पास में
पर अज्ञान के कारण मंदिर-मंदिर
भटक रहा मानव बेचारा ।
मुझमें खोया है ये जहान सारा ।
गीता के आदेश में,
बाईबल के आदेश में,
कुरान के निर्देश में,
गुरुग्रंथ के आदेश में
मैं ही तो रहता हूं, हर धर्म के परिवेश में ।
चाहे जिस धर्म, जाति का हो
मैं तो उसी का जिससे सहृदय पुकारा ।
मुझमें खोया है ये जहान सारा ।
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