स्थान- कचंदा
जिला- जांजगीर-चांपा/ छत्तीसगढ़
विधा- कविता ( दार्शनिक चिंतन )
शीर्षक- कर्मों का फल
कर्मों का फल
कभी न कभी मिलेगा, कर्मों का फल ।
सुफल चाहता है, तो सद्कर्म करता चल ।
नेकी कर दरिया में डाल, रख सुविचार ।
नीति के महत्व को मन से कर स्वीकार ।
नीति-नीष्ठा ने प्रति आस्था हो प्रबल ।
कभी न कभी मिलेगा कर्मोंं का फल ।
चरित्र पर पड़ता है चिंतन का प्रभाव।
दुश्चिंतन से होता है मन का भटकाव।
चिंतन - मनन कर , हरदम व हरपल ।
कभी न कभी मिलेगा, कर्मों का फल ।
सद्बुद्धि , सद्भावना से करो सदा कर्म ।
सद्मार्ग में चलना बनाओ, अपना धर्म ।
प्राप्त होगा अगर आत्मशक्ति का बल ।
कभी न कभी मिलेगा , कर्मों का फल ।
मन की इच्छाशक्ति मत मारो कभी ।
मन में जोश भरो, आज और अभी ।
मिलेगी सफलता , आज नहीं तो कल ।
कभी न कभी मिलेगा कर्मों का फल ।
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