स्थान-नवापाराखुर्द/सक्ति
जिला -जांजगीर-चांपा/छत्तीसगढ़
विधा-कविता मुक्त
विषय-शीतलता
शीर्षक-----शीतलता के छांव तले
शीतलता के छांव तले,आओ चलते हैं ।
श्रेष्ठ मारग सबसे यही, इसमें ढ़लते है ।
शीतलता की सबको जरुरत,
उष्णता का नाम न लो ।
खुशियां बांटों सारे जग में,
दुख का कभी भी शाम न दो ।
सुख सबको अच्छे लगते,इससे सजते हैं ।
बनो बनाओ शांति का पुजारी,
युद्ध कलह से क्या लेना ।
सारी दुनियां सुंदर रचती,
है मात्र शांति सेना ।
अन्याय,अधर्म,असत्य से, मिलजुल लड़ते हैं ।
झूठों का कभी राज्य हुआ न ,
अनैतिकता ने कभी जीता है ।
सारी सृष्टि सत्य की है ,
कर्म अध्याय जिसका गीता है ।
मानवता का जहां पाठ दिखे,उसको मन से पढ़ते हैं ।
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