Monday, October 12, 2020

कांकेर से नलिनी बाजपेयी की रचना- लोग पत्थर

रचना कारा-नलिनी बाजपेयी 
संबलपुर, जिला-कांकेर( छ .ग.)
    शीर्षक-लोग पत्थर के हुए है
    

 🍃 *लोग पत्थर के हुए* 🍃  
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दुनियां बदल गई,
प्रकृति ने भी अंगड़ाई ,
,लोग पत्थर के हुए है,
रोने लगी खुदाई।

बस्ती वीरान हुई,
मनुजता  लूटी गली-गली,
घर बसाने लायक शहर न थी,
बस्ती-बस्ती में होने लगी 
नित लड़ाई।

रिश्ते खिलौनों से टूट रहे
सरे राह,
टूटे खिलौने से मन 
कैसे बहले,सजे कैसे
अंगनाई?

चांद-तारों की थी ख़्वाहिशें, 
जुगनू से मन लगे,कैसे
तुम्हारे साथ चार कदम 
चल न सके,
नवजीवन की बजे कैसे 
शहनाई?

कल फना हो जाऊंगी 
कहीं किसी मोड़ पर,
स्याह चादर में लिपटी
कैसे कौन बनेगा
रहनुमाई?

हवस की आग समेटे खड़े 
गली-गली दरिंदे,
बिटिया की लाज बचे कैसे, 
पत्थरों में खो गई
रोशनाई।

तन मन जल रहा,
मायूसियां बिखरी पड़ी,
पत्थरों से लोग हुए है
कैसे भरूं मन में 
तरुणाई।

सपने सारे बदरंग हुए,
आश निराश हुई,
पत्थर के लोग हुए ,
प्रीत के रंगों से कैसे करूँ 
पहुनाई।

दुनियां बदल गई 
प्रकृति ने भी ली अंगड़ाई,
लोग पत्थर के हुए हैं ,
रोने लगी खुदाई।

      नलिनी बाजपेयी
संबलपुर, कांकेर (छ. ग.)

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