जिला-कांकेर,छग
शीर्षक- स्कूली पाठ्यक्रम में पत्र-लेखन का समावेश ।
पत्र- लेखन का सदियों से बड़ा ही महत्व रहा है ।भावनाओं की अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम रहा है पत्र-लेखन । स्कूली पाठ्यक्रम में इसे समावेश करने से औपचारिक और अनौपचारिक पत्र के भेद को विद्यार्थी समझते हैं ।पत्र-लेखन के तरीके का यह ज्ञान भविष्य में काम आता है ।
आज के मोबाईल युग में इसकी महत्ता निष्प्राण हो गई है ।
पत्र -लेखन परीक्षा तक ही सीमित हो गया है ।कभी पत्र -लेखन के द्वारा ही संदेश पहुंचाया जाता था ।कालिदास के मेघदूत में बादलों के द्वारा संदेश पहुँचाया जाता था ।कबूतर भी अच्छा संदेश वाहक साबित होता था।संवदिया कहानी में संदेश वाहक वाहक गाँव में ही विशेष व्यक्ति होते थे ।
अब मोबाईल ने दूरियां कम कर दी है ।बच्चे पत्र लेखन में रुचि नहीं लेते ।पत्र लेखन प्रतियोगिता तक सिमटकर रह गये हैं ।
इस शैली के दैनिक जीवन में उपयोग की आवश्यकता है ।यह अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम है,इसे पाठ्यक्रम तक ही सीमित न रखें।जवाहरलाल नेहरु का पिता का पत्र पुत्री के नाम इसका सशक्त उदाहरण है ।इसके अलावा अब्राहम लिंकन का पत्र अपने पुत्र के शिक्षकों के नाम अद्भुत पत्र लेखन के उदाहरण हैं ।यह शैली लोकाचार में परिणित हो।पत्र लेखन का स्कूल पाठ्यक्रम में समावेश सर्वथा उपयुक्त है ।
मीराआर्ची चौहान
कांकेर,छग
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