संबलपुर,जिला-कांकेर (छ .ग.)
विषय-एकावली अलंकार
मैं क्षिति हूँ परिक्रमा
करती हूँ धरा धुरी पर,
उदित हो रहे आदित्य
धरा पर पूरी।
मेदिनी पथ पर प्रकट हो
मार्तण्ड भास्कर कहलाता है।
धरती गगन को प्रदीप्त
कर प्रभाकर भास्कर कहलाता है।
कल-कल सरिता बहती,
पल-पल जग की
प्यास बुझाती,
जीवन जीना है तो
जीने का हर राज बताती।
दग्ध-दग्ध होकर
ज्वाला जलती,दग्ध
ह्रदय को मथती है।
जीवन का हर राज बताती,
स्वंय राज को राज बनाती।
खुले गगन में विचरण करते,
गगन पर तारे है सवार,
भोर की बेला में दिनेश
उदित होता दिनकर बन सार।
हौले-हौले पवन करती,
तीव्र समीर से बातें,
ग्रीष्म की तपन बन
ताप में बिताती रातें,
बन बयार तुम ग्रीष्म पर
अनिल बन छा जाओ।
*एकावली अलंकार का प्रयोग*-
1.क्षिति हूँ परिक्रमा करती धरा धुरी पर,
2.मेदिनी पथ पर मार्तण्ड भास्कर कहलाता है।
3.दग्ध -दग्ध ज्वाला जलती,दग्ध ह्रदय को मथती है।
4.हौले-हौले पवन करती तीव्र समीर से बातें।
5.दिनेश उदित होता दिनकर बन आदि।
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नलिनी बाजपेयी
संबलपुर, कांकेर, (छ. ग.)
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