जिला :- महासमुन्द
विधा :- छंद मुक्त कविता
शीर्षक :- सुन्दर
अलंकार :- एकावली अलंकार
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सुन्दर, भाव सुन्दर, मन सुन्दर,
मुख से निकले बोल सुन्दर।
सुन्दर सदा विचार हो,
सुन गदगद सकल संसार हो।
सुन्दर रूप का नहीं कोई काम,
व्यर्थ सौंदर्य प्रसाधन सामग्री तमाम।
सुन्दर नजरिया जग को भाये,
सकल जगत मनुभाव लुभाये।
सुन्दर मुख है श्याम सलोना,
बस हृदय से सुन्दर होना।
क्षणिक सुख सुन्दरता तन की,
सुन्दर भाव से तार तार झंकृत मन की।
सुन्दर जग में सुन्दरता की परिभाषा,
हो शब्दकोष में मृदु भाषा।
व्यर्थ है जोगी यह काया,
हां जग में है बस मोह - माया।
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व्याख्या :- उपरोक्त पंक्तियों में रचनाकार ने सुन्दर शब्द का विस्तार करते हुए जग में सुन्दरता की परिभाषा को प्रकट किया है। साथ ही तन की सुन्दरता से श्रेष्ठ मन की सुंदरता को माना है।
काव्य अलंकरण के लिए एकावली अलंकार के प्रयोग का प्रयास किया है।
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