स्थान- देवगाँव
जिला- रायगढ़, छत्तीसगढ़
विधा-मुक्त कविता
खुद को बरसों से रखा हूं संभाल के।
आगे बढ़ा रही कदम संभाल संभाल के।
में चर्चा आम हो गया हूं केअब इतना ।
एक मसला बन गया गांव की चौपाल के ।
फिर दस्तक दी दिसम्बर की ठिठुरन ने
बुझी चिंगारी जल उठी गुजरे साल के।
एक बदली सी छाई इन आँखों में आके।
ये घटा है क्या तेरे घुंघराले बाल के।
तूने देखा नही क्या था सजदा मेरा।
रख दी है थाली में कलेजा निकाल के।
दर्द क्या था उसे बता भी ना सका रवि।
रखना पड़ा दिल में यूं ही संभाल के ।
रवि नारायण रायगढ़ छत्तीसगढ़
मौलिक व स्वरचित रचना
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