Saturday, October 10, 2020

उर्मिला सिदार की रचना- जागो सपूतों

रचनाकार- उर्मिला सिदार
 ग्राम -बुलाँकी 
 जिला -रायगढ़ छत्तीसगढ़
 विधा कविता (मुक्तक छंद)
 शीर्षक-"जागो सपूतों"

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         *जागो सपूतों*

जागो देश के संस्कारिक सपूतों ,
नव भारत निर्माण करो ।
जन -जन के जीवन में पुनः ,
नई  संचेतना संचार भरो।

नई आकाश है नया दिवाकर,
नई सुबह है, प्रकाश नई। 
नई आशाएँ, नई उम्मीदे, 
नई उमंगे ,बहारें नई।
कई वर्षों से मुरझाए चेहरों में,
मधुर -मधुर मुस्कान भरो।

जागो देश की संस्कारित सपूतों,
नवीन भारत निर्माण करो।।1।।

द्वारा -द्वार पर बैठे मनु कुछ, 
नूतन सोच विचार करें ।
गुनगुनाती बालाएंँ खुशी से ,
मधुर गान  सुनाया करें। 
नव युग की  नूतन स्वागत में ,
प्रेम राग नव गान भरो ।

जागो देश के संस्कारित सपूतों,
नवीन भारत निर्माण करो।।2।।

डाल -डाल पर बैठी पंछी कुछ,
नव कलरव राग सुनाते हैं।
गुनगुनाते भंवरे भी मस्त ,
बगियन में मंडराते हैं ।
रुष्ण कलियों में फिर से ,
नव रस मधुरम् मधु भरो ।

जागो देश के संस्कारित सपूतों,
नवीन भारत निर्माण करो।।3।।

 नई,  सोच है ,नवीन समझ है ,
 नई उत्साह, नया पथ है ।
 अपना पराया कर त्याग,
 सख्य भाव का हो उद्गार।
 दलित समाज में फिर से ,
 प्रेम स्नेह नव भाव भरो। 

जागो देश के संस्कारित सपूतों,
नवीन भारत निर्माण करो।।4।।


विद्यालय हो पावन मंदिर, 
विद्या अधिकार है तुम्हारा। 
तुम इसके संरक्षक सुरक्षक,
तुम्हीं इसके भागीदार हो ।
जन-जन ज्ञान दीप जलाकर,
नवयुग का आव्हान करो ।

जागो देश के संस्कारी सपूतों,
नवीन भारत निर्माण करो।
जन-जन के जीवन में फिर से,
नई संचेतना संचार भरो।।5।।

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 रचनाकार उर्मिला सिदार ग्राम बुलाँकी जिला रायगढ़ छत्तीसगढ़

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