Friday, October 16, 2020

महासमुन्द से द्रोपती साहू "सरसिज" की रचना- जीवन दायिनी

"जीवन दायिनी"
द्रोपती साहू "सरसिज"
महासमुन्द(छ.ग.)
रचना का शीर्षक-"जीवनदायिनी"
                   विधा-कविता
                    *********
मैं तरूण तरू अबोध अज्ञानी।
तु चतुर माली जीवनदायिनी।।

यह मेरा जीवन तेरी धरोहर है,
तुझसे ही तो है पहचान मेरी।
रखती मेरा ध्यान हर पहर है,
तुझसे ही है हर मुस्कान मेरी।।

प्रकृति की ऐसी सुन्दर रचना,
देख पाया हूँ मैं तेरा उपकार है।
पल-पल पर मेरी चिंता करना,
मेरा हर सपना करती साकार है।।

जीवन की तपती दुपहरी में,
तु शीतल घनी-घनी छाँव है।
कठिनाई काँटों भरी डगरी में,
तु अपना सा महकता गाँव है।।

ईश्वर का साकार रूप तेरा,
अद्भुत ममता क्षमता तुझमें।
जन्म देकर नया जन्म लेती,
सखी पालक समता तुझमें।।

मैं तरूण तरू अबोध अज्ञानी।
तु चतुर माली जीवनदायिनी।।
             *******
          द्रोपती साहू "सरसिज"
        


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