Friday, October 16, 2020

रायपुर से एच-एस-अरमो की रचना- माँ

रचनाकार-एच-एस-अरमो, अरमान ।
निवासी-बायरन बाज़ार,रायपुर ।
जिला-रायपुर,छत्तीसगढ़ ।
शीर्षक- ""माँ ""    ।
विधा- छ्न्द मुक्त कविता ।
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     ☆☆||••"" माँ ""••||☆☆
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माँ तेरे रूप अनेक---
तू ही दुर्गा,तू काली और--
शारदा,जगदंबा व भवानी ।
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माँ ! तू जननी भी है---
और माता तू पृथ्वी समान ।
माँ तू  ,हरदम हमारे लिए--
दुःख सहती व सुख देती ।
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कष्टों को,मेरे तुम हरती---
फिर भी,हरदम --
तुम,मुझको खुशियों का---
एहसास ही,सदा कराती ।
       ÷÷÷÷÷÷
हम सन्तानें--
सुख की चाहत में,
तुमसे,अलग हो जाते ।
अक्सर,वो कैसे हैं माँ--
निष्ठुर व निर्दयी लोग,
जो,बेहिचक ऐसे कारनामे,
सहजता से,चुपचाप कर जाते ।
       ÷÷÷÷÷÷÷÷
आज माँ---
इक नारी,जब पत्नी बन जाती,
माँ की,ममता का---
क्यों,बेरहमी से खून,कर जाती ।
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इक नारी ---
जब माता ,है बन जाती,
संतान को जन्मती ,
समाज में,फिर उसकी--
और भी,अधिक प्रतिष्ठा-
है,अक्सर बढ़ ही जाती  ।
      ÷÷÷÷÷÷÷
माँ की, नाराजगी --
होते हैं--हँसते जख़्म,
और मन के अन्दर---
छुपा हुआ होता ,
फिर भी---
शीतलता भरा ,ममत्व--- का,अनुरागीपन।
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जरा,हम-तुम,इक बार---
मन से,मंथन कर के,
तो,देखें यारों --।
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माँ तो,सिर्फ ---
माँ ही होती है--?
ना इसकी तुलना,किसी से,
होती है - - -
इसलिए,तो ये- - -
आदि और अन्त होती है ।

====== इति ============
व्याख्या:--उपरोक्त रचना के माध्यम से यह कहना चाहता हूँ कि माँ के कई रूप होते हैं और माँ की महिमा की तुलना करना बहुत मुश्किल काम है ।
===स्वरचित-प्रस्तुति ========
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