जिला,राज्य: मैसूर, कर्नाटक,
विधा: कविता,
शीर्षक: ए वतन तेरे लिए
ए वतन तेरे लिए
कभी,शहीदों के घर आंगन जाकर देखना,
उनके दिलों की धडकनों को जरा टटोलना,
शहीद नहीं सोचता,जीता कभी अपने लिए,
जिसका दिल धड़के केवल वतन के लिए।
हे मां!सुन आया तेरे पास,मैं एक मांस का छोटा सा,
निराकार लोथड़ा बनकर,
तूने मुझे अपने अगाध प्रेम, ममता,
त्याग से तराश,साकार
पेश किया एक वीर बनाकर।
है मां! मैंने कसम खाई है जीने मरने की,
मिट जाऊंगा पर,आंच न आने दूंगा तुझ पर,
दुश्मन के नापाक इरादों को मिटा दूंगा,
लहू बहा मैं,अपने वतन का ऋण चुकाऊंगा।
हे मां!देख,बहुत खुशी का दिन है,
आज मातृभूमि के लिए हो गया मैं खुद कुर्बान,
हो रहा जगत में तेरा ही गुणगान,
बढ़ाई मैंने भी अपने वतन की आन,बान और शान।
आ रहा हूं,वतन,शान से तिरंगे में लिपट कर,
स्वागत कर मेरा मां, खुशी के आसूं लेकर,
आज मैंने दोनों मांओं का ऋण चुका दिया,
वादा रहा,अगले जन्म फिर वापस आऊंगा।
नहीं भूला मां मैं तेरी गोद, अपने बचपन को,
मां,मन करता मेरा,गहरी नींद में सोने को,
सातों जन्म लेने फिर यहीं वापस आऊंगा,
मां तेरी,अपने वतन की सेवा, रक्षा करूंगा।
कहता एक शहीद बड़े फक्र और शान से,
मेरा सारा जीवन जुड़ा मां और मातृ भूमि से,
देख मां,आज शपथ लेता हूं हमेशा के लिए,
जिऊंगा,मरूंगा केवल अपने वतन के लिए।
डॉ बी. निर्मला,
मैसूर, कर्नाटक।
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