जिला-रायगढ़,छत्तीसगढ़
विधा- संस्मरण
विषय- विलुप्त होते खेल
शीर्षक- वो बाटी के दिन
वो बाटी के दिन
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जून के महीने की बात है मैनपाठ के यात्रा के दौरान जंगल के बीच एक बीहड़ से गाँव में अनायास रुकना पड़ा। छोट छोटे बच्चे बाटी खेलने में मशगूल थे आज भी ये बच्चे इस खेलो के महत्वाकांक्षा को अंगीकृत किए हुए हैं, उनके खेल की प्रति तनन्यता को देखकर बचपन की याद आ गई जब हम लोग बाटी खेला करते थे। खेल के प्रति जो ईमानदारी हुआ करती थी,आज कुछ यादें मैं साझा करना चाहूंगा।
बरसात का मौसम था, हम लोग बरामदे में बाटी खेल रहे थे, चूंकि नियम के मुताबिक बाटी को गड्ढे तक लाने के लिए कोहनी का सहारा लिया जाता था।
पर बच्चे बहुत बदमाश थे, परेशान करने के लिए बाटी को गोबर में नाली में गिरा दिया करते थे, पत्थर के बीच ले जाकर छोड़ दिया करते थे। वही मेरे साथ हुआ गिट्टी और मुरुम के बीच से बाटी को लाते लाते मेरे कोहनी छिल गये थे। खून बाटी लाल हो गया था, मेरे आंखों से निरंतर आंसू बह रहे थे। मेरी मम्मी मुझे गाली दे रही थी, घर चलो बरसात हो रही है लेकिन मुझे पता था कि बीच मे खेल को छोड़ दिया तो फिर मुझे कल नही खेलने देंगे। मैं रोते रोते बाटी को गढ्ढे तक लाता बाटी नाली में चला गया ।नाली बदबूदार था अब कैसे कोहनी से बाटी को निकाल पाता,सारे बच्चे मेरे हालत का मजा ले रहे थे।
मुझे शुरू से मैदान छोड़कर भागना अच्छा नही लगता था। अतः मैं आंख बंद किया और नाक को सिकुड़ते हुये दोनो कोहनी को नाली में डालकर बाटी निकाला और खेत खतम किया । लेकिन घर आने के बाद मम्मी से जो धुलाई हुई आज भी नही भूल पाया हूँ।
वर्तमान में यही खेल का स्वरूप बदल चुका है। हम उन पारम्परिक खेलों को यतार्थ में खेलने के बजाये मोबाइल में खेलने लगे है। जिसका परिणाम ही है कि ये खेल विलुप्त होने के कगार में है।
मौलिक रचना
अजय पटनायक
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