ग्राम -बुलाँकी
जिला- रायगढ़ (छत्तीसगढ़ )
विधा -आलेख
विषय -खेल होते विलुप्त
*खेल होते विलुप्त*
जैसे-जैसे टेक्नोलॉजी की दुनियाँ विकसित होते जा रही है ।वैसे वैसे प्राकृतिक व्यवस्था ह्रास की ओर बढ़ते जा रहा है। खेल मानव पारंपरिक व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण अंग है। जिसका प्रयोजन शारीरिक स्वस्थता के लिए उपकारी सिद्ध होता है। आज वर्तमान में खेल मनोरंजन, प्रतियोगिता आय के स्वरूप में देखा जा रहा है। जो मानव व्यवस्था का बाधक है। वर्तमान के युवा आज खेल के महत्व को समझे बिना खेलकूद प्रतियोगातमक स्वरूप में खेलने के लिए आय के स्रोत बनाने के लिए बाध्य हो रहे हैं। श्रम से वर्तमान में युवा मुंह मोड़ रहे हैं। जहां कम शारीरिक मेहनत और मानसिक श्रम लगे एवं आय अधिक मिले ,इसी उद्देश्य की पूर्ति करने में लगे हुए हैं। ऐसा ना कर पाने पर मन कुंठा की ओर जा रहा है। जिंदगी में नीरसऔर निराशा मे जीन्दगी गुजारने के लिए मजबूर है। खेल श्रम का एक भाग है। खेल प्रायोजन शारीरिक पुष्ट के लिए खेला जाता है। शरीर के माध्यम से, मानसिक खेल मानसिकता की विकास के लिए जो सार्थकता के अर्थ में हो। मनुष्य को शारीरिक और मानसिक खेल दोनों की आवश्यकता होती है। जिंदगी जीने के लिए खेल का भी मर्यादा, सीमा रेखा होता है। सही समय में खेल पर ध्यान देने से ही शरीर की स्वस्थता शुद्ध रहती है। निरोग होकर श्रम करने योग्य होने तक खेल की प्रयोजन है। अक्सर बचपन में खेल शरीर की पुष्ट के लिए खेला जाता है।प्राकृतिक खेल से मन खुश और शरीर स्वस्थ्य रहता है। वर्तमान में आधुनिक खेल साधनों का सभी के लिए पूर्ति होना संभव नहीं है। पारंपरिक खेलों में कोई आडंबर नहीं होता था ।बच्चे एकत्र होकर खुशी-खुशी जो भी मानसिकता में खेल सूझता था ,सब बड़े प्रेम और भाईचारे की भावना से खेलते थे। हमारे जमाने में अनेक प्रकार की पारंपरिक खेल होते थे जो खेलने से बड़ा मनोरंजन और स्वास्थ्यवर्धक होता था ।खेल मानसिक और शारीरिक दोनों प्रकार के खेले जाते हैं। हमारे बचपन में खेले जाने वाले खेल जैसे फिट्टूल, छुर्रू ,नदी पहाड़, रेस टीप, भवरा ,बाँटी, गोवर्धन, फुगडी, लंगडी, घोर घोर रानी, गिल्ली डंडा, गुड्डा गुड्डी, जल क्रीड़ा , आटठी,पग्गा दुआ, कसाडी आदि और अनेक से खेल खेले जाते थे ।आज टेक्नोलॉजी की दुनिया में यंत्रों पर बच्चे टिके हुए हैं ।आज पारंपरिक खेल विलुप्त होते जा रहा है ।बच्चे मोबाइल गेम कंप्यूटर पर समय बिता रहे हैं। वर्तमान में भौतिक विकास बढा है ।बौद्धिक विकास की कमी समाज में देखने को मिल रहा है ।पहले बच्चे परिवार के साथ मिलकर कारोबार में सहयोग करते थे। संस्कार सीखते थे ।अभी वर्तमान में एकाकी जिंदगी जीने पर टेक्नोलॉजी दुनियाँ मजबूर कर रही है। दिनो दिन संबंधों में बिखराव ,भाव का अभाव ,एकाकीपन, नीरस जिंदगी लोगों में दिखाई दे रहा है। खेल के साथ-साथ बच्चे पढ़ाई, घर में सहयोग करते थे ।अभी बच्चे श्रम से दूर, धीरे-धीरे घर परिवार से दूर होते जा रहे हैं। आज हमारे बचपन याद आने पर बीती हुई पल, कुछ पल के लिए सुकून दे जाती है ।वर्तमान में लोग सच्चाई का विरोध और भविष्य की चिंता से ग्रसित हो रहे हैं ।पारंपरिक जीवन शैली भावात्मक होता था। वर्तमान जीवन शैली भौतिक आत्मक हो गया है। सुविधा है ,लेकिन मन में सुख नहीं है। पारंपरिक खेल संस्कृति, लोक नृत्य लोकगीत एवं अन्य विधायें लुप्त होती जा रही है। वैज्ञानिक युग की देन से सामाजिक कुरीतियों का बढ़ावा और अत्याचार, भ्रष्टाचार का फैलाव दिनों दिन समाज में जोरों से पसर रहा है। अब मनुष्य को भविष्य के बारे में सोचने का वक्त आ गया है। पारंपरिक कुछ अच्छे संस्कार का प्रेरणा और वर्तमान में सच्चाई पर विश्वास तथा भविष्य के लिए समाधान ढूंढने का वक्त आ गया है ।आज मनुष्य को श्रम की ओर लौटने की आवश्यकता है एवं कुछ अच्छे पारंपरिक विधाओं की ओर लौटना आवश्यक है ।विलुप्त होते जा रहे संस्कृति पर ध्यान देने की आवश्यकता है ।उसकी संरक्षण सुरक्षा के लिए विचार करने की समीचीन आवश्यकता है।
उर्मिला सिदार रायगढ़ छत्तीसगढ़
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