जिला :- महासमुंद
विषय :- परिवर्तन
शीर्षक :- परिवर्तन
विधा :- छंद मुक्त कविता
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प्रतिपल बदले जीवन जोगी,
परिवर्तन ही सार है।
कहो कभी क्या रूका हुआ,
सूरज, चंदा व संसार है।
कहो कभी क्या रोक सके हैं,
बारिश के मस्त फुहारों को।
भला कभी क्या रोक सके हम,
बसंत के उन बहारों को।
परिवर्तन होता हर जीव में,
परिवर्तन ही श्रृंगार है।
एक ही चीज पर टिकने से बेहतर,
परिवर्तन उपहार है।
परिवर्तन सुर ताल में लाती,
नित्य नवल ही मधुरता।
परिवर्तन से ही बढ़ पाती,
वन उपवन की सुन्दरता।
परिवर्तन से मिला यह जीवन,
जीव जगत का आधार है।
रोचकता है बनी हुई,
बस सृष्टि का उपकार है।
प्रतिपल ना बढ़े तो नदियाँ,
हो जाती अक्सर मैली है।
बढ़ कर आगे पाती निर्मल जल,
नित बहती वह अलबेली है।
सुनो सुनो यह परिवर्तन है,
जीवन का एक सत्य परम।
सहर्ष ही स्वीकार करो नित,
मानो उसे निज का धरम।।
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व्याख्या :- उपरोक्त पंक्तियों में रचनाकार ने परिवर्तन का वर्णन करने का प्रयास किया है।
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