Thursday, October 29, 2020

जांजगीर-चांपा से गिरधारीलाल चौहान की रचना- परिवर्तन

नाम-गिरधारीलाल चौहान
स्थान-नवापाराखुर्द /सक्ति
जिला -जांजगीर-चांपा/छत्तीसगढ़
विधा-कविता मुक्त
विषय-परिवर्तन
शीर्षक-परिवर्तन को मानिए

परिवर्तन को मानना पड़ेगा ।
होता कैसे पहचानना पड़ेगा ।
है यह सबके लिए आवश्यक ।
परिवर्तन का ध्वज तानना पड़ेगा ।

इसी से मिटेगी छायी हुई गरीबी ।
सबके जीवन लायेगी अमीरी ।
भूल जाओगे सब फकीरी ।
जिनमें चमक नहीं मांजना पड़ेगा ।

परिवर्तन प्रकृति के अटल नियम ।
आते समय पर बदल कर जाते ।
कोई भाते कोई इसे न भाते ।
जो चाहिए राह ताकना पड़ेगा ।

विचारों का क्यों केन्द्रीय करण ।
आधारों का क्यों केन्द्रीय करण ।
किसी का जीवन किसी का क्यों मरण ।
सबको बराबर ही उछालना पड़ेगा ।

किसी के आंख क्यों अश्रु ।
किसी के होठ क्यों हंसी ।
असमानता की इतनी छाया क्यों ।
जो खाई पड़ी बराबर पाटना पड़ेगा ।

किसी को घर के लाले हैं ।
किसी के घर काले हैं ।
किसी के घर उजाले है ।
सबका हो सम राह निकालना पड़ेगा ।

कोई फुटपाथ में खेले ।
कोई विद्यालय को चले ।
किसी का जीवन जगमगाता ।
नियमों को बांधना पड़ेगा ।

किसी का जीवन सिर्फ सेवा के लिए ।
किसी का जीवन सिर्फ मेवा के लिए ।
किसी का जीवन सम्मान के लिए ।
ये जो बने बंधन काटना पड़ेगा ।

हो जाये उथल-पुथल ।
जीवन जायेगा सबका बदल ।
जरुरी है इसका दखल ।
एक बार सबको जागना पड़ेगा ।

धरा पर सब है मानव ।
कर्म से कोई कोई मानव ।
धर्म से कोई कोई मानव ।
कैसे उन्हें एक मानना पड़ेगा ।

व्याख्या---कवि के द्वारा परिवर्तन सम्पूर्ण मानव के लिए आवश्यक है हजारों वर्षों से से चली आ रही व्यवस्था में परिवर्तन आवश्यक है जिससे सम्पूर्ण मानव का जीवन समान हो ।

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