रायगढ़, छत्तीसगढ़
विषय-दार्शनिक
विधा-मुक्त
मेरे सिद्धान्तों की दार्शनिकता
मुठ्टी की रेत सी फिसल रही
जो बांधे रही रिश्तों की डोर
स्वार्थ से वशिभूत क्यूँ हो रही ?
प्यार के बदले प्यार मिलेगा
अपनापन और सम्मान मिलेगा
इसी आस में बंधी निभाती रही
जिम्मेदारीयां जो दूसरों की थीं
अब लगता दृष्टिकोण बदल गई
अपने और सपने भी पीछे छूट गए
सम्बन्धों की नींव कमजोर हुई
स्वार्थसिद्धि ही मानो धर्म हुई
सदियों से संजोए सपनो का
अचानक रूप बदल गए
अपनी दार्शनिकता का,
सिद्धान्तों का स्वयं गवाह बन गए।
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