Friday, October 9, 2020

अनुरमा शुक्ला की रचना- नश्वर काया

रचनाकार - अनुरमा शुक्ला
स्थान- दुर्ग (छ.ग.)
विधा- मुक्त
विषय- दार्शनिक
शीर्षक-
        *नश्वर यह काया*

जीवन की सत्यता यही,नश्वर       
  है यह शरीर,
इस बात से अनभिज्ञ कोई
 प्राणी नहीं,
फिर क्यों फँसता मोह-माया
 में हर कोई,
खाली हाथ आये थे जाना है
 सब छोड़ यहीं,
महत्वकांक्षा, तृष्णा के पीछे
    ये दुनिया दौड़ रही ।

हर हाल में मुस्कुराना, जीवन
    का मूलमंत्र यही
कैसे छुपायें दर्द अपने
 भावनायें जो हैं दबी,
चिंता की रेखाएं पड़ ही जाती
  है ललाट पर कभी,
साझा कर दुख अपना मन
  साफ रखिये,
नाम उनका रह गया जिन्होने
 अच्छ कर्म किये,
अनश्वरता परोपकार की
  साबित कर ही दिये।

चलो फिर कुछ ऐसा करने की
  ठान लिजिये,
बुझे चेहरे पर मुस्कान ही
  बिखेर दीजिये,
सहेजना कुछ भी नहीं सब
  न्यौछावर किजिए,
सफल,सार्थक मानुष जन्म                    
  कर देह त्यागिये ।।

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