पेंडरवानी , बालोद, छत्तीसगढ़
विषय - सब नश्वर है
सब नश्वर है
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इकठ्ठा किये जा रहें हैं , बर्बादी का सामान,
तेरे साथ तो दूर , ए न जाएंगे श्मशान ,
धन कमाने हर सिद्धांतों को तोड़ा ,
पाई -पाई इकट्ठा कर- कर जोड़ा ,
चाहतों के पीछे भागता रहा ,
खाख- धूल फाकता रहा ,
भावनाओं के लहर में बह गए ,
पा जाते ईश्वर , पर नश्वर में रह गए,
ए मान - बड़ाई कब तक ?
झूठों के लिए लड़ाई कब तक ?
खुद को मिलने वाले दुखों पर ही ,
आखिर रब को दुहाई कब तक ?
राजे-महाराजे साथ कुछ ले जा न सका ,
तू अदना क्या ले जाएगा ?
असमर्थ हो जाएगा जब तन ,
तब रोयेगा , पछताएगा ,
काम न आएगा धन से यारी ,
मिट जाएगा , तेरी दुनियादारी ,
जब रंग -तमाशे फीके पड़ेंगे ,
फिर अपने, अपने से लड़ेंगे ,
आखिर नर किसके लिए जोड़ जाता है ?
जब दुर्लभ तन श्मशान में छोड़ जाता है ,
दया ,प्रेम, मानवता से सबका चेहरा खिल जाना है ,
मिट्टी का तन आखिर जग में, मिट्टी में मिल जाना है ,
सब जग मिथ्या ,सब ही झूठा ,
उस रचनाकार से तू क्यों रूठा ?
यह माया रचयिता ही सार ईश्वर है ,
और यह जग सारा ही नश्वर है ,
- - शैलेन्द्र चेलक - -
बहुत सुंदर रचना चेलक सर्
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