स्थान -दुर्ग (छ.ग.)
विधा- मुक्त
विषय- शीतलता
शीर्षक-
*शीतल चंद्रमा*
शीतल समीर, शीत ऋतु
शांत रहे मन आनंदित,
उष्णता उग्रता है लाती,
शीतलता सदा सुखदायी ।
कहता चंद्रमा रवि से..
तुम दिनकर, मैं सुधाकर
तुम उष्ण, मैं शीतल
प्रकृति के दोनों सौदर्य
तुम दिन की थकान
मैं उसका मरहम,
तुम हो तेज ऊजाला
मैं ठंडी मंद रोशनी ।
फिर भी..
जीवनदायिनी किरण तुम
तुमसे ही है मेरा वजूद
मेरी आभा है, तुम्हारी रोशनी
तुम ना हो, तो कैसे निखरुं,
मैं पूर्णिमा, तुम अमावस
तुम बिन मैं हूं व्यर्थ ।।
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