Friday, October 23, 2020

बलौदाबाजार से संतराम कुम्हार की रचना- शीतलता

रचनाकार -  संतराम कुम्हार 
   जिला -  बलौदाबाजार (छ. ग.) 
     विधा - मुक्त कविता 
   शीर्षक - " शीतलता के रुप "
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सुबह सुहावना मौसम प्यारा, 
सफेद कोहरे ने ढेरा डाला है। 
नजरें सिमट गई कुछ दूरी तक,
हवाओं ने ही इसको सम्हाला है।। 

ओस की बूँदे फूल-पत्तों पर, 
अपनी चमक छोड़ जाती है। 
मानों हरे-पौधों को ये शीत, 
गहरी नींद से सुबह जगाती है।।

शीत लहर शीतलता भरी, 
ठंडक का अहसास कराती है। 
स्वास्थ्यवर्धक यह अनुकुल हवाएं,
योग, व्यायाम में ध्यान लगाती है।। 

शीतलता जब चरम सीमा पर, 
अनाथों को बहुत सताती है। 
नंगे बदन कंपकंपाती ठिठुरन को, 
खुले आसमान में रात बिताती है।। 

सर्दी की मार झेलते मजबूर ये, 
समस्या का इनका समाधान कीजिए। 
मानवता का धर्म निभाकर, 
हो सके तो गर्म वस्त्र दान दीजिए।।

शीतल नीर, पेट की अग्नि, 
ज्यों शांत कर जाती है। 
सदाचार की शीतलता से, 
मानव अपनी पहचान बनाती है।।

शीतलता का प्रतीक चाँद, 
धरती में उजियारा फैलाती है। 
शीतल व्यक्तित्व के धनी महापुरुष, 
अपने कर्मों से पदचिन्ह बना जाती है।। 
                              
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मौलिक रचना (स्वरचित) 
संतराम कुम्हार 
बलौदाबाजार (छ.ग.)

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