राज्य-पश्चिम बंगाल
शीर्षक- "बाढ़ का प्रकोप"
विधा-तुकांत
बाढ़ के प्रकोप से सारी दुनिया बेहाल है
मुश्किल हो गया जीना सबका बुरा हाल है
मुख्यमंत्री का हवाई सर्वेक्षण हो गया है
कागज पर बाढ़ का समाधान हो गया है
बस्तियाँ सारी उजाड़ हो गई हैं
सड़कें सभी नदियाँ बन गई हैं
जिसकी गई उसकी तो सभी गई
खेती बारी सब तो चौपट हो गई
सबके घरों में घुस है गया बाढ़ पानी
कहीं बुढ़ापा रोये तो कहीं रोये जवानी
बाढ़ का प्रकोप है बड़ा ही भयानक
मानव खुद बना आज तो खलनायक
लोगबाग सब जहाँ के तहां त्रस्त हैं
सरकार चुनाव के लिए भी व्यस्त है
प्रकृति की मार सब लोग झेल रहे हैं
नेताजी लोग तो सब खेल खेल रहें हैं
फेल हो गया है अब तो सरकारी तंत्र
शायद ही बचाये यदि कोई ईश्वरीय मंत्र
पीने के लिए पानी नहीं खाने को अन्न
फिर भी राज्यों के मुखिया होते प्रसन्न
एक तो करेला दूजे नीम भी है चढ़ी
कोरोना के साथ बाढ़ भी आगे बढ़ी
पहले से ही थी कोरोना महामारी
अब न जाने फैले कौन सी बीमारी
कुछ राज्यों में हर साल का है किस्सा
सब लूट रहें हैं अपना-अपना हिस्सा
राहत सामग्री की तो लूट हो रही है
आज भी मानवता भूखे सो रही है
हर साल आता है बाढ़ ढाता है कहर
तबाह हो जाते गाँव के गाँव कई शहर
समय रहते करते नहीं हैं कुछ उपाय
बाद में हो जाते सब के सब निरुपाय
प्रकृति के साथ करते खूब खिलवाड़
लेती प्रकृति बदला जीवन क्यों पहाड़
खूब काटो पेड़ और खूब भरो तलाब
प्रकृति ले रही अब तो अपना हिसाब
बाढ़ कितनी ही जिंदगियाँ लील गई
नेताजी को चुनावी मुद्दा तो मिल गई
बाढ़ की तो और भी लंबी कहानी है
"दीनेश" ये तो प्रकृति की मनमानी है
दिनेश चंद्र प्रसाद "दीनेश" कलकत्ता
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