जिला/महासमुंद
राज्य - छत्तीसगढ़
विषय - "धरती माँ की बिटिया"
विधा - गीत
मेरे बिन जाने ना जग में ,
कोई जीवन की गहराई ।।
मैं नारी माँ , बेटी पत्नी ,
दुनिया को सुंदर सजाई ।
फिर भी मैं ही क्यों रातों में ,
निर्मम जाती हूँ जलाई।।
मैं तो धरती माँ की बिटिया ,
पर होती हूँ क्यों पराई।
मैं तो धरती ......
स्वार्थ भरे इस संसार में ,
क्या मेरी पहचान नही?
नारी बिन है पुरुष अधूरे ,
करते क्यों सम्मान नही?
कातिल लूटेरों की दुनिया,
मैं लूँ कैसे अंगड़ाई ?
मैं तो धरती माँ की बिटिया ,
पर होती हूँ क्यो पराई?
मैं तो धरती माँ .......
रंगीन जग का पीर सहती,
सुख-दुःख सभी का जानू मैं।
कर्म क्षेत्र में आगे बढ़ कर ,
सब को अपना ही मानू मैं ।
सृष्टि में नैतिकता ,सभ्यता,
संस्कार भी मैं ही जगाई ।
मैं तो धरती माँ की बिटिया ,
पर होती हूँ क्यों पराई ।।
मैं तो धरती...........
मन्दिर में देवी की मूरत,
मैं हूँ पूजा की थाली ।
वेदों , पुराणों का मंत्र मैं ,
मैं ही पूरब की लाली ।।
दुनिया के कण-कण में देखो ,
मैं ही खुशबू सी समाई।
मैं तो धरती माँ की बिटिया ,
पर होती हूँ क्यों पराई ।
मैं तो धरती माँ.......
धन्यवाद ,जय हिंद
पुष्पा ग़जपाल "पीहू"
महासमुंद (छ. ग.)
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