राज्य-उत्तर प्रदेश(लखनऊ)
शीर्षक-निर्णय का द्वंद
विधा-तुकान्त
जब जीवन के दोराहों पर ,असमंजस के चौराहों पर
कोई निर्णय लेना मुस्किल हो,और साथ मे अंधी मंजिल हो
जब मन मस्तक मे द्वंद छिड़े, हृदय विवेक लड़े झगड़े
फिर किसको कैसे समझाऊँ किस ओर कहां मैं झुक जाऊँ
यह मूल समस्या जीवन की ,अविराम रही उलझी उलझी
पथ जाने कितने मोड़ मुड़े पर दिल दिमाग ये नही जुड़े
सालीन विवेकी राहो मे काँटो के निर्मम तार के मिले
हृदय गवाही दिया जिसे उसमे रखे औजार मिले
ऐसी दुविधा ही बनी रही जब भी जितने भी कदम चले
अब तक कोई ना हुआ अपना सबने मिलकर विस्वास छले।
माधवी मिश्रा
लखनऊ
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