संबलपुर, जिला-कांकेर,(छ .ग.)
विषय-छत्तीसगढ़ में गद्य का विकास
विधा-आलेख,दिनाँक-28.10.20
*छत्तीसगढ़ में गद्य का विकास*
हिंदी साहित्य में गद्य का विकास आधुनिक काल से माना गया है ।स्वतंत्रता संग्राम एवं राष्ट्रीयता का प्रभाव साहित्य में नजर आने लगा था। औद्योगिकरण एवं आवागमन के साधनों के विकास के साथ भावना और विचारों की प्रधानता साहित्य में देखने को मिली। जिसके फलस्वरूप पद्य के साथ गद्य का विकास भी प्रारंभ हो गया। आधुनिक हिंदी साहित्य में गद्य का विकास पूरे देश में प्रारंभ हुआ ।भारतेंदु युग के पूर्व, भारतेंदु युग, द्विवेदी युग ,शुक्ल युग से लेकर अद्यतन युग तक चल रहा है।
छत्तीसगढ़ में भी गद्य साहित्य समय के साथ साथ पल्लवित पुष्पित होती रही है। छत्तीसगढ़ का गद्य साहित्य भी निरंतर परिमार्जित होती जा रही है। इस कार्य में पंडित बंशीधर शर्मा ,शिव शंकर शुक्ला, लखनलाल गुप्त ,केयूर भूषण, कृष्ण कुमार ,परदेशी राम वर्मा आदि ने अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है ।परदेशी राम वर्मा, सुरेश तिवारी, उर्मिला शुक्ला, आदि छत्तीसगढ़ की कहानी विधा के सशक्त हस्ताक्षर माने जाते हैं। स्वर्गीय हरि ठाकुर ने छत्तीसगढ़ी भाषा में प्रथम व्यंग संग्रह लिखने का कार्य किया। छत्तीसगढ़ी में प्रथम लघुकथा संग्रह खोरबहरा कृत( तोला गांधी बनाबो ) लिखी गई। इसी क्रम में बहुत सारे लेखक और भी उभरे और गद्य लेखन में बहुत विविधता दिखने लगी। सभी गद्य लेखकों ने सभी विधाओं में अपनी अपनी लेखनी चलाई ।छत्तीसगढ़ साहित्य का इतिहास लगभग 1000 वर्ष पहले का माना जाता है। इसे निम्न युगों में बाँटा गया है।
1.गाथा युग- 1000 से 1500 ई.तक
भक्ति युग- 1500 से 1900 ई.तक
3.आधुनिक युग- 1900 से लेकर अब तक)
छत्तीसगढ़ में पद्य का विकास तो बहुत पहले से हो रहा था।मगर गद्य का विकास कार्य में तीव्रता छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद और छत्तीसगढ़ी भाषा को राजभाषा का दर्जा मिलने के बाद से हो रहा है।
आज पद्य के साथ गद्य की सभी विधाओं में निरंतर कार्य हो रहा है। लगभग सभी गद्य विधाओं में लेखकों की लेखनी सशक्त हस्ताक्षर के रूप में प्रगट हो रही है। प्रथम छत्तीसगढ़ी उपन्यास के रूप में प्रथम कहानी के रूप में हीरू की कहिनी,तथा मोंगरा,को जाना जाता है।प्रथम कहानी प.सीताराम कृत सुरही गईया, व्यंगकारों में शरद कोठारी तथा सशक्त समीक्षक के रूप में डॉ विनय कुमार पाठक का नाम बड़े आदर के साथ लिया जाता है।
छत्तीसगढ़ में साहित्य कारों की साधना रंग ला रही है।भविष्य में गद्य साहित्य का सुनहरा रूप हमारे समक्ष होगा।
नलिनी बाजपेयी
संबलपुर, कांकेर, (छ .ग.)
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