Thursday, October 29, 2020

जब तक काम खत्म नहीं कर लेते, तब तक घर जाओगे कैसे? : (आलेख) प्राज

बेरोजगारी उन शक्तियों के निष्क्रियता से परिभाषित की गयी है, जो कार्य करने के इच्छुक हैं। सार्जेंट फ्लोरेंस के इन शब्दों में जहाँ बेरोजगारी शब्द को परिभाषित करने पूर्ण प्रयास परिलक्षित होता है। रोजगार और बेरोजगार दोनो शब्दों के बीच में वर्तमान के स्थितियों का समागम का प्रयास करने जा रहा हूँ कि कोविड-19 महामारी को एक वर्ष पूर्ण होने की स्थिति में है। भारतवर्ष में देखें तो मार्च से लेकर वर्तमान अक्टूबर की ढ़लान तक कोरोना का कहर लगातार जारी है। महामारी का दौर चल रहा है, लगातार लॉक्डाउन फिर अनलॉक्ड के विभिन्न स्तर चल रहे हैं। इस बीच सेवा, रोजगार और बेरोजगारी पर केन्द्रित एक विचार अंजाने से मन:पटल पर जागृत हुआ। कोविड-19 के भयावह दुष्परिणामों में से एक रोजगार जाने का भय और बेरोजगारी बढ़ने की स्थिति है। शासकीय सेक्टरों के कर्मचारियों की स्थिति तो, प्राईवेट सेक्टर के बनिस्बत ठीक है। वर्तमान दौर में एक ओर जहाँ निजी सेवा क्षेत्रों और उपक्रमों के मालिकों को अच्छे से ज्ञात है कि वर्तमान में रोजगार परिवर्तन की स्थिति एक तरफ कुआँ दूसरे तरफ खाई की स्थिति में है। यानी जो कर्मचारी वर्तमान में सेवारत् हैं उन्हे कार्य, अतरिक्त कार्य के लिए दबाव या बुद्धिजीवीयों के भाषाशैली में कहें तो शोषण रूपी प्रस्तरों के गुलेल चलाये जा सकते हैं। 
     26 जनवरी 2005 में आई फिल्म रंग दे बसंती के पटकथा से उद्धृत डॉयलॉग-  "जिंदगी जीने के दो ही तरीके होते हैं- एक जो हो रहा है होने दो, बर्दाशत करते जाओ...या फिर जिम्मेदारी उठाओ उसे बदलने की" इसी के भांती वर्तमान दौर में एम्प्लाई की स्थिति है। उनके पास विकल्पहीनता के चलते, कोल्हू के बैल बनने के अलावा कोई दुसरा मार्ग प्रशस्त होता नहीं दिख रहा है। 
          बहरहाल, वर्तमान स्थितियों से कहीं ज्यादा दुखद एम्प्लायर के मनमानी का है जिसमें अल्प समय में अत्याधिक श्रम का मांग करना, वहीं श्रम शुल्क के रूप में मूल वेतन की अपेक्षा अल्प वेतन, कार्मिकों के आर्थिक स्थिति को कमजोर कर शोषण के विरूद्ध बोलने से पूर्व जुबान की सिलाई होना प्रदर्शित कर रहा है। ना चाहते हुए भी निजी कर्मचारी वर्ग को कार्य करना पड़ता है। मेंटेनेंस के नाम पर, कभी पेंडिंग वर्क तो कभी आगामी डिमांड या निरिक्षण के नाम पर कार्मिकों की सेवा में अत्यधिक श्रम का बोझ डालना कहाँ तक सही है, यह एक विचारणीय प्रश्न है? एक ओर जहाँ दैनिक किसी ना किसी स्तर पर कार्य कर रहे सहकर्मियों के जाती नौकरियों के देखकर, कार्यरत् कर्मचारियों में नौकरी बचाने की प्रतिस्पर्धा में, स्वयं पर हो रहे अत्याचार का अंदाजा तक नहीं लगा पाते हैं। श्रमशक्ति का नियोजन, उपयोग एवं नियंत्रण निजी क्षेत्र में पूंजी निर्भर है। पूंजीपतियों के लिए तो माइल स्टोन सेट करना तो बहुत ही आसान है, लेकिन उस मिल के पत्थर तक पहुचने के लिए जाने कितने कर्मचारियों को पाँव छील जाते हैं। इसका जवाब भी मौन मुख से पगार की तिथि को रोज कैलेन्डर में निहारने वाला वह कर्मी ही जान सकता है।
       शायद, आप सहमत होगें की, लोग निजी सेवा क्षेत्रों की अपेक्षा शासकीय सेवा क्षेत्रों में कार्य को महत्व देते हैं। कारण, 60 वर्षों तक की सेवा का गारंटी के साथ-साथ, नियमित वेतन की स्थितियां हैं। वहीं निजी क्षेत्र में अवलोकनार्थ देखें तो वहीं कर्मी अपने से वरिष्ठ अधिकारी के बातों सस्वर समर्थन देता है, जिसकी ईएमआई अधिक होता है। वर्तमान दौर में प्रतिशतता के आधार पर वेतन प्रणाली, अत्याधिक सेवाभार से जहाँ एक ओर सेवारत् कर्मी का जीवन तनावपूर्ण बना हुआ है। वहीं महामारी के वजह से खत्म होती नौकरियों से बेरोजगारी का ग्राफ उछाल पर उछाल की स्थिति लिये हुए है। इसके दुष्परिणाम स्वरूप अपराधों के ग्राफ में भी बढ़ोतरी होना लाजमी है।


लेखक
पुखराज प्राज
छत्तीसगढ़

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