नाम:डॉ बी निर्मला,"राजी",
जिला,राज्य:मैसूर,कर्नाटक,
विधा:कविता
विषय: जीवन की सच्चाई
जीवन की सच्चाई
कैसे सारी उम्र गुजर गई, जीवन की भाग दौड़ में,
कब वक्त गुजर गया,
पता ही नहीं चला,
कंधे पर चढ़ने वाले वाले बच्चे,
हंसते खेलते खिलौनों से,
कब कंधे तक आ गए,
पता ही नहीं चला,
किराए के घर से शुरू किया था अपनी जिंदगी का सफर,
कब खुद के घर में आ गए,
पता ही नहीं चला,
पैदल चलते चलते,सायकिल पर कब चढ़ गए,
कैसे,अब हम सुंदर कारों में घूमने लगे हैं,
पता ही नहीं चला,
कभी निभाते थे खुशी से जिम्मेदारी,
माता पिता की,
कब बच्चों के लिए हो गए जिम्मेदार हम,
पता ही नहीं चला,
दर दर भटकते थे,नौकरी की तलाश में,
इतनी जल्दी कब,कैसे रिटायर्ड हो गए,समय का,
पता ही नहीं चला,
बच्चों के लिए कमाने,बचाने,जोड़ने में रहे हमेशा व्यस्त,
प्यारे बच्चे हो गए,कब हमसे बहुत दूर,
पता ही नहीं चला,
एक जमाना था,जब दिन में भी हम बेखबर सो जाते थे,
कब,क्यों,कैसे,रातों की नींद उड़ गई,
पता ही नहीं चला,
कष्टों,दुखों को झेलते झेलते यहां तक आ गए,
जीवन में खुशियों की आहट कब भूल गए,
पता ही नहीं चला,
करते थे कभी प्यार,भरोसा आंख बंदकर अपनों पर,
कब,कैसे,आज हो गए वे सभी पराए,
पता ही नहीं चला,
अब सोच रहे हैं, हम अपने लिए भी कुछ पल जी लें,
कब इस शरीर ने साथ देना छोड़ दिया,
पता ही नहीं चला।
कवयित्री,
डॉ बी निर्मला,
मैसूर,कर्नाटक।
स्वरचित एवं सर्वाधिकार सुरक्षित।
Saturday, October 17, 2020
मैसूर से डॉ बी निर्मला की रचना- जीवन की सच्चाई
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