रचनाकार--जगतसिंह ठाकुर'बंजारीवाले'
स्थान--सारंगढ़ , रायगढ़ { छग }
विधा--कविता
शीर्षक--माँ महिमा कही न जाये
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माँपर जितना कलम चलायें , जितना करें विचार ।
माँ की महिमा कही न जाये , सारी सृष्टि मँझार ।।
ममता की मूरत माँ होती , जग में पूरणकाम ,
स्वर्ग बसे माँ के चरणों में , सारे तीरथ - धाम ।
माँ की सेवा बिना रहे हैं , व्रत - पूजा बेकार ।।
माँ की महिमा कही न जाये , सारी सृष्टि मँझार ।।१
पीड़ा झेल जन्म देती माँ , दाँव लगाती जान ,
सारी वेदना भूल जाती , निहार के सन्तान ।
हित में माँ अपने बच्चों की , जीवन तक दे वार ।।
माँ की महिमा कही न जाये , सारी सृष्टि मँझार ।।२
आदि श्रेष्ठ गुरु माँ ही होती , देती ज्ञान सदैव ,
सबकी वह पहचान कराती , भरती बुद्धि तथैव ।
बच्चों की माँ भविष्य गढ़ती , जीवन का शृंगार ।।
माँ की महिमा कही न जाये , सारी सृष्टि मँझार ।।३
अपने मुँह का कौर खिलाती , सहे भूख सन्ताप ,
सूखेपर सुला सन्तान को , गीलापर है आप ।
अमृत तुल्य माँ दुग्ध पिलाती , पोषण रहा अपार ।।
माँ की महिमा कही न जाये , सारी सृष्टि मँझार ।।४
माँ करती मल-मूत्र सफाई , छोड़ घृणा की भाव ,
सारे बच्चों के ऊपर माँ , रखती है समभाव ।
होती माँ ही निश्चय प्यारे , जगती की आधार ।।
माँ की महिमा कही न जाये , सारी सृष्टि मँझार ।।५
सेवा - करुणा भाव रखे माँ , सहनशील मन धीर ,
उसका ऋण चुका नहीं पाये , पाके मनुज शरीर ।
मूरख 'ठाकुर' माताजी का , सका न कर्ज उतार ।।
माँ की महिमा कही न जाये , सारी सृष्टि मँझार ।।६
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व्याख्या--माँ की महिमा वर्णनातीत है , फिर भी कुछ
प्रयास मेरे द्वारा किया गया है ।
Friday, October 16, 2020
रायगढ़ से जगतसिंह ठाकुर'बंजारीवाले' की रचना- माँ
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