Friday, October 16, 2020

रायगढ़ से जगतसिंह ठाकुर'बंजारीवाले' की रचना- माँ

रचनाकार--जगतसिंह ठाकुर'बंजारीवाले'
स्थान--सारंगढ़ , रायगढ़ { छग }
विधा--कविता
शीर्षक--माँ महिमा कही न जाये
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माँपर जितना कलम चलायें , जितना  करें विचार ।
माँ की महिमा  कही न जाये , सारी  सृष्टि   मँझार ।।

ममता  की   मूरत  माँ  होती , जग  में   पूरणकाम ,
स्वर्ग  बसे  माँ के  चरणों  में , सारे  तीरथ  -  धाम ।
माँ  की  सेवा  बिना  रहे   हैं , व्रत -  पूजा   बेकार ।।
माँ की महिमा  कही न जाये , सारी  सृष्टि   मँझार ।।१

पीड़ा  झेल  जन्म   देती  माँ , दाँव   लगाती  जान ,
सारी    वेदना    भूल   जाती , निहार  के   सन्तान ।
हित  में माँ अपने  बच्चों की , जीवन  तक दे  वार ।।
माँ की महिमा  कही न जाये , सारी  सृष्टि   मँझार ।।२

आदि श्रेष्ठ गुरु  माँ  ही  होती , देती   ज्ञान    सदैव ,
सबकी वह  पहचान  कराती , भरती  बुद्धि  तथैव ।
बच्चों की माँ भविष्य  गढ़ती , जीवन   का  शृंगार ।।
माँ की महिमा  कही न जाये , सारी  सृष्टि   मँझार ।।३

अपने मुँह का कौर खिलाती , सहे   भूख  सन्ताप ,
सूखेपर  सुला   सन्तान   को , गीलापर   है   आप ।
अमृत तुल्य माँ दुग्ध पिलाती , पोषण  रहा  अपार ।।
माँ की महिमा  कही न जाये , सारी  सृष्टि   मँझार ।।४

माँ   करती  मल-मूत्र सफाई , छोड़ घृणा की भाव ,
सारे   बच्चों   के   ऊपर  माँ , रखती  है  समभाव ।
होती  माँ  ही   निश्चय   प्यारे , जगती  की आधार ।।
माँ की महिमा  कही न जाये , सारी  सृष्टि   मँझार ।।५

सेवा - करुणा भाव  रखे  माँ , सहनशील मन धीर ,
उसका ऋण चुका  नहीं पाये , पाके  मनुज  शरीर ।
मूरख  'ठाकुर'  माताजी  का , सका न कर्ज उतार ।।
माँ की महिमा  कही न जाये , सारी  सृष्टि   मँझार ।।६
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व्याख्या--माँ की महिमा वर्णनातीत है , फिर भी कुछ
              प्रयास मेरे द्वारा किया गया है ।


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