Thursday, October 15, 2020

सुन्दरगढ़ से मोनालिसा बेहरा की रचना- धरती का स्वर्ग

रचियता-मोनालिसा बेहरा
सुंदरगढ़(ओडिशा)
विधा-यात्रा-वृतांत
विषय-जलप्रपात एवम प्राकृतिक सुंदरता
शीर्षक-धरती का स्वर्ग- सिक्किम

           सन 1975 में भारत के 22 वां  राज्य के रूप में सिक्किम को शामिल किया गया उससे पहले वह भारत का हिस्सा नही था। सिक्किम जहाँ की हर चीज खूबसूरत है -सुबह ,शाम हो या रात और यहां की खूबसूरती भी भगवान की देन है।मनुष्य का नही साक्षात ईशवर ने आकर यहां के कण-कण में सुंदरता भर दी है।
                     हम शहरों में समतल स्थानों पर रहने वालों के लिए पहाड़ों पे जाना जन्नत से कम नही होता।सिक्किम का गन्तोक शहर को जब मैंने पास से देखा तो उसकी खूबसूरती को बस देखते ही रह गई इतनी खूबसूरती आंखों में समा नही पा रही थी।ट्रेन से जब सिलीगुड़ी पहुचेंगे तो वहां से टैक्सी लेकर आगे गंतोक जाना पड़ता है जो कि 120 किलोमीटर है पर एक खूबसूरत सा सफर यहीं से शुरू हो जाती है ।एक ओर पहाड़ और दूसरी ओर साथ बहती तीस्ता नदी और उसमें बोटिंग का लुफ्त उठाते लोग जब ये सब देखने को मिलता है तो अनायास ही मन चंचल हो उठता है और लंबी सफर की थकान मिट जाती है। रास्ता साफ रहा तो यही 4 घण्टे में आप गंतोक शहर पहुंच जाएंगे ।वहां के होटलों में एक चीज आश्चर्य में डालती है और वह है कमरे में ए.सी.तो दूर पंखों तक का ना होना उसकी वहां जरूरत ही नही पड़ती क्योकि बारह महीने तो वहां ठंड पड़ती है और कभी  भी मूसलाधार बारिश शुरू हो जाती है। अगले दिन मौसम साफ़ होने के कारण होटल के खिड़की से ही विश्व की तीसरी सबसे बड़ी पर्वत कंचनजंघा का दुर्लभ नज़ारा देखने को मिला।
देखकर मन प्रसन्न हो गया है ।
                                     हम दिन भर गंतोक शहर घूमते रहे वहां बनझखरी वाटरफॉल, हनुमान गढ़ी और पैराग्लाइडिंग का मज़ा लिया ।गंतोक में खरीदारी के लिए महात्मा गांधी रोड नाम का मार्केट है जो कि हमारे होटल के नीचे ही था वहां से हमने कुछ गरम कपड़े लिए क्योकि वहाँ उसी की जरूरत पड़ने वाली थी।सिक्किम के लोग बहुत ही सादगी भरा जीवन जीते हैं बातें बहुत मीठी करते हैं और मेहमान को भगवान का दर्जा देते हैं।ज्यादातर यहां बुद्धिस्ट हैं परंतु वे सभी धर्मों का सम्मान करते हैं  ।समाज महिला प्रधान है घर की जिम्मेदारी उनपर होती है जबकि पुरूष घर संभालते हैं। यहां के लोग बहुत सुंदर होते हैं लड़कियां तो इतनी फैशनेबल और सुंदर होती हैं कि सिने जगत की सुंदरियां इनके सामने कुछ नही।दलाई लामा पे विशेष आस्था रखते हैं।
             नाथुला दर्रा समुद्र तल से यही कोई 17000 हजार फीट की ऊंचाई पर है जो कि उत्तर सिक्किम में है यहां बाबा मंदिर है जो कि किसी भगवान की नही बल्कि एक ऐसे जवान की मंदिर है जिसने अपनी मौत के बाद भी चीन की सीमा पर अपने देश की रक्षा के लिए अपना योगदान दिया।यहां हजारो लोग दर्शन को आते हैं और सर झुकाते हैं चीन की सेना भी बाबा हरभजन सिंग के मंदिर पर अपना सर झुकाती है।यह चीन की सीमा से लगा हुआ है इसलिए यहां जाने के लिए गंतोक से ही पास बनवाना पड़ता है।इस ऊंचाई पर हमारे जवान तंबू लगाए अपना ड्यूटी निभाते हैं जहाँ हम ठंड से कपकपाते रहते हैं ।यहां बज रहे देशभक्ति के गानों को सुनकर सिहरन पैदा हो जाती है और श्रद्धा से हमारा सर झुक जाता है।
                           यहां रास्ते सँकरे और घुमावदार होते हैं कार से बाहर झाँक के देखो तो कलेजा मुँह को आ जायेगा।इन रास्तों में भी चींटी की कतार सी कारें लगी होती हैं एक रुक जाए तो लम्बी जाम लग जाती है।गगनचुंबी पेड़,फूलों की घाटियां ,हर दस कदम पे बहते झरने,घाटियां,पहाड़ हर तरह की प्राकृतिक सुंदरता से भरपूर सिक्किम।रंग-बिरंगे झंडे जो खुशी के मौके पर और सफेद झंडे जो दुख पे ये लोग लगाते हैं उसपर लिखे मंत्र इनकी आस्था का प्रतीक है।भारत मे आप कहीं भी चले जाएं लोगों की भावना,आस्था एक सी ही दिखती हैं।
                                        दूसरे दिन हम दक्षिण सिक्किम की यात्रा पर निकल गए जहां चाय की बागानों में पत्तियां तोड़ती सिक्किमी परिधान बोखु पहने युवतियां दिखी जो श्रम के कारण और भी सुंदर लग रही थीं।नामची शहर में बनी चार-धाम मंदिर में एक साथ सभी देवी देवताओं के दर्शन कर रावेंगला में जब कई एकड़ में फैले बुद्धा पार्क को देखा तो मन धन्य हो गया। इतनी प्राकृतिक सुंदरता के बीच जीवन से संघर्ष करते वहां के बच्चे पहाड़ो पर कई किलोमीटर पैदल चल कर स्कूल जाते,पत्थर तोड़ती स्त्रियों को देख मन पसीज जाता है।सिक्किम की नैसर्गिक सुंदरता को शब्दों में बांधना  सचमुच कठिन है और इस खूबसूरती को आंखों में कैद करना मुश्किल ,बस श्रद्धा से सर झुका सकते हैं।


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