द्रोपती साहू "सरसिज"
महासमुन्द, छत्तीसगढ़
शीर्षक;"चाँदनी रात"
विधा-कविता(तुकांत)
अलंकार-अनुप्रास अलंकार
*****
(१)
चाँदनी रात में,
चंचल चितवन चकोर नयन।
मन में लिये नेह,
निहारे निशा का अंतरमन।।
(२)
रूपसी चाँद नहाकर ताल में,
गई निखर-निखर।
तारों की भी बारात ने,
उतर भिगोए तन मन हर।।
(३)
लगी सुहानी चाँद ज्यों,
नई नवेली सजी दुल्हन।
सुहाना है दृश्य लगा चमकने,
निशा का आँगन।।
(४)
चाँद की चाँदनी में नहाकर,
देखो धरती इतराई।
चाँदी सी चमक से चाँद ने,
चित्तचोर की चित्त चुराई।।
(५)
राजकमल रजनीगंधा,
रातरानी ने रागिनी गाई।
मधुर मनोहर मस्त हवा भी,
झुमकर धरा महकाई।।
(६)
सुन्दर मुखड़ा निर्मल झील में,
निहारे चाँद परछाई।
रूप सलोना देख मोहिनी मूरत,
मंद-मंद मुस्काई।।
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Thursday, October 15, 2020
महासमुन्द से द्रोपती साहू "सरसिज" की रचना- चांदनी रात
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