स्थान- दुर्ग , छ.ग.
विधा- मुक्त ,तद्गगुण अलंकार का प्रयोग
शीर्षक - मोह के धागे
धागे ये कैसे उलझे हुये
सुलझते ही नहीं मन के,
कुछ यादें धुंधली सी,
खुशनुमा सा एहसास,
कुछ सामिप्य होती ऐसी
जिससे निखरता है वजूद
जैसे फूलों पर ओस की बूंदे
जल ही तो है रुकी हुई,
पर चमकती मोतियों सी
रवि किरणों के स्पर्श से,
फिर खो जाती बन वाष्प
उमड़ता बादल गगन पर
धरा पर आने को आतुर
होता मिलन को अधीर,
सुंदर मनोरम दृश्य देखो
क्षितिज पर मिलते दोनों
होती मनोरम लालिमा
सूर्योदय और सूर्यास्त की
मन को कितना लुभाये
मन से मन का बंधन,
छूटे ना लाख छुड़ाये,
चंचल मन पीछे भागे
ये मोह के हैं जो धागे ।।
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तद्गगुण अलंकार
जल का बदलता रुप
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