संबलपुर -जिला -कांकेर (छ. ग.)
विषय- *मोह*(तदगुण अलंकार का प्रयोग)
दिनाँक-06.10.20
*मोह -पतंग*
मन मेरा मोह पतंग
सा उड़ता जाएं
रूप तेरा देखकर
तन मन बेसुध हुआ जाएं।
फूलों की महक से मन महके
और तन बेसुध हुआ जाएं,
रजनी की तिमिर तेरे
बालों में समा जाएं।
पिय वियोग में मन
मेरा गजरा से मुरझाएं,
रत्नाकर की उर्मियों
में मन मेरा हिचकोलें खाएं।
मरूभूमि की शुष्कता
मेरे तन मन को तड़पाएं,
शिशिर की ठंडी आग
मुझे बर्फ सा बना जाएं।
पावस मनभावन देख
जियरा मेरा हर्षाएं,
पिय मिलन की बातों
से मन मयूर बन जाएं।
जब देखूँ पिय की
सुरतिया आँगन चन्दन
वन हो जाएं,
ह्रदय शीतल हो गई
जैसे बरगद छाँव हो जाएं।
*तदगुण अलंकार का प्रयोग*-
1.तन बगिया हो जाएं।
2.रात का तिमिर बालों में समा जाएं।
3.शिशिर की ठंडी आग मुझे बर्फ बना जाएं।
4.मन मयूर बन जाएं
5.आँगन चन्दन वन हो जाएं आदि।
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नलिनी बाजपेयी
संबलपुर, कांकेर,(छ. ग.)
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