जिला - बलौदाबाजार (छ. ग.)
विषय - विलुप्त होते खेल
विधा - संस्मरण
शीर्षक - डंडा पचरंगा
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// डंडा पचरंगा //
खेल मानव जीवन का अभिन्न अंग है । हर उम्र के लोग अपने ढंग से किसी न किसी खेल को पसंद करते हैं । वर्तमान में खेलों का स्वरूप बदल गया है जो व्यवसाय ज्यादा और खेल कम है । फिर भी ग्रामीण क्षेत्र के पुराने खेल आज भी हमारे मन में गुदगुदी पैदा कर देती है । बचपन के ऐसे कई खेल हैं जो आज विलुप्ति के कगार पर है । कसाड़ी , तिरेल , पगा-दुआ , नूनछुटूर , फलीर , डंडा पचरंगा , फुगड़ी , भौंरा , बाँटी , गिल्ली डंडा आदि ऐसे अनेक मनोरंजन व स्वास्थ्य प्रदायक खेल हैं जिन्हें आज के बच्चे खेलना तो दूर नाम तक नहीं जान पाते । बचपन का खेल सम्बन्धी एक छोटा सा संस्मरण प्रस्तुत कर रहा हूँ ।
उस समय मैं मिडिल स्कूल में पढ़ता था । हमारे घर के पास एक बाड़ी में 3 - 4 नीम के पेड़ थे जिसकी शाखाएँ आपस लगभग सटी हुई थी । दोपहर में हम 6 -7 बच्चे उसी नीम के पेड़ में चढ़कर '' डंडा पचरंगा '' खेलते रहते थे । लड़का - लड़की मिलकर दोनों साथ ही में खेलते थे । उस जमाने मे हमारे मन मे कोई भेदभाव या कोई गलत विचार का नामोनिशान भी नहीँ था । यह सन् 1982 - 83 अर्थात् 38 वर्ष पहले की बात है । हमारा गाँव जंगल से लगा हुआ पठारी गाँव है । आधुनिक सुख - सुविधा का उस समय कोई साधन नहीँ था । तब ऐसे ही बिना एक पैसा खर्च किये गाँव के देहाती खेल सारे बच्चों के मन बहलाते थे ।
डंडा पचरंगा के इस खेल में सभी बच्चे पेड़ की शाखाओं पर ही इधर - उधर भाग रहे थे और हमारा एक साथी पेड़ के ऊपर से ही विभिन्न शाखाओं में भ्रमण करता हुआ हमको छूने का प्रयास कर रहा था । हम सबको बड़ा मजा आ रहा था । इसी दौरान मैं पेड़ से फिसल गया । ज्यादा चोट नही आई किन्तु हल्का सा पैर में लगा था । फिर मैं कभी इस खेल को दुबारा नही खेला । केवल पढ़ाई में ही ध्यान देने लगा । घटना बहुत छोटी है लेकिन मेरे लिए अविस्मरणीय है ।
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