सुंदरगढ़, ओडिशा
विधा-संस्मरण
विषय-विलुप्त होते खेल
एक भूली-बिसरी याद बनकर रह गई है
हमारे बचपन के खेल खिलौने। स्कूल से घर आते ही बस्ता फेंक मोहल्ले के सारे बच्चे जमा हो जाते और कई तरह के खेलों का आनंद लेते जो कि घर के बाहर मैदान या खुले जगहों पे हम खेलते जैसे गिल्ली-डंडा, फुगड़ी,फिट्टू, चोर-पुलिस,लुका-छिपी या घर बनाकर मिट्टी के बर्तनों पे खाना बनाना,तितलियां पकड़ना,गुड्डे-गुड़ियों का खेल खेलने,उनका ब्याह रचाना, सूखे घास पे चढ़कर उसपर फिसलना।हम बचपन में कई मज़ेदार खेल खेलते कभी-कभी तो रूठ भी जाते और बड़ी आसानी से दो उंगलियों को जोड़ फिर से दोस्ती हो जाती।हमने जो बचपन जिया है आज के बच्चों को नसीब नही हो रहा।हम जो भी खेलते मिलकर झुंड में जैसे ताश, कैरम,लूडो,कंचा।अतीत में जब झांको तो बचपन खिलखिलाता नज़र आता है।
बहुत दुख की बात है कि आज ये मनोरंजक खेल विलुप्त होने के कगार में है और शायद आने वाली पीढ़ियों में इनका नाम भी सुनाई ना दे।आज बच्चे अपने पड़ोस के बच्चों को भी नही पहचानते ना ही मिलकर कोई खेल खेलने में उत्सुक होते हैं उन्हें मोबाइल में तकनीकी खेल खेलने में ही आनंद आता है बस कमरे का दरवाजा बंद कर अकेले मोबाइल में ही लगे रहते हैं।इससे उनका मन और तन दोनों ही प्रभावित हो रहा है।ग्रामीण अंचल में भी खेलों का महत्व कम होते जा रहा है।आज के बच्चे अगर जानते हैं तो सिर्फ क्रिकेट के बारे में हॉकी हमारा राष्ट्रीय खेल होकर भी गुमनाम ही है।
अतीत के गलियारों में बचपन मुस्कुराती,खेलती,दौड़ती-भागती थी,स्वस्थ थी पर अब वो सब याद ही बनकर रह गई है।
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