जिला :- महासमुन्द
विषय :- विलुप्त होते खेल
शीर्षक :- लुका छुपी
विधा :- संस्मरण
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आज बैठे बैठे जब बोरियत महसूस होने लगी तो मैंने एल्बम निकाली। एल्बम के हर पन्नों के साथ जीवन के कुछ यादगार पन्नें भी पलटकर सामने आ गये। मेरे स्मृति पटल पर वे यादें मानो लुका- छुपी खेल रही थी, और जब मैंने बड़ी सिद्दत से खोजने का प्रयास किया तो यादें स्मृति पटल पर चलचित्र की भांति गतिमान हो गई।
नन्हे-मुन्ने बच्चों का एक दल जो तितलियों के मानिंद एक घर से दूसरे घर कुछ इस तरह भाग रहे थे जैसे तितलियाँ एक डाली से दूसरे में उछल कूद कर रही हो। और उन सब की खोज में एक बच्चा सभी घरों में झांक है। अंतिम क्षण तक वह इस आस के साथ प्रयासरत है कि उसे सफलता जरूर मिलेगी। यह खेल बच्चों के उत्साह व ऊर्जा को भली-भांति प्रकट कर रही है। सभी नई नई तरकीब के साथ नए जगह खोज रहे हैं ताकि अपने आप को सुरक्षित रख सके। एक दूसरे से श्रेष्ठता की दौड़ में उन्माद नदी सा बह रहे हैं।
समय ने फिर करवट बदली जैसे यादों के इस धारावाहिक का आज का एपिसोड समाप्त हो गया हो, परन्तु मन में एक टीस है कि लुका छुपी का वह मनोरंजन भला खेल उन बच्चों के झुंड सा कहीं छुप गया है, और हम अपनी बारी आने पर उसे और उनसे मिलने वाली ऊर्जा को मोबाइल जैसे यंत्रों के खेलों में ढूंढ़ने का प्रयास कर रहे हैं। जाने यह लुका छुपी कब तलक जारी रहेगी.............
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