सुंदरगढ़(ओडिशा)
विधा-आलेख
विषय-चिड़िया का घोंसला
बचपन की यादों में से एक हमारे घर के पीछे का वो नारियल का पेड़ है जिसमे कई तरह के चिड़िया के घोंसले टंगे होते थे। कभी-कभी तेज हवा से वे जमीन पे गिर जाते थे और उनमें जो अंडे होते वे टूट जाते थे।तब अंडो से उतना लगाव नही था पर घोंसले मिलने पर बहुत खुश होते थे उसे घर मे लाकर सजा देते थे।पर वैसी कारीगरी आज तक नही देखी कितनी बारीक और गददेनुमा आकार के होते थे जिसे नारियल के पत्तो को चीरकर चिड़िया बुनती थी और उसमें अपने छोटे बच्चों को सहेज कर रखती थी।तब चिड़िया को सिर्फ साँप का भय होता जो उसके अंडो को तोड़ देती और उसके बच्चों को खा जाती थी। पर अब ना वो नारियल का पेड़ है ना ही चिड़िया का वो घोंसला।
औद्योगीकरण और नगरीकरण ने चिड़ियों से उनका घोंसला ही छीन लिया और उन्हें दर-बदर की ठोकर खाने को छोड़ दिया ।मुझे तो याद करना पड़ता है कि मैंने आखरी बार गौरैया को कब देखा था। गांव और शहरों में जो लंबे-लंबे मोबाइल के टॉवर और उनके रेडिएशन से यह नन्ही प्रजाति गुम होने के कगार पे है अब वो दिन दूर नही जब हम अपने बच्चों को एक चिड़िया होती थी कहकर कहानी सुनाया करेंगे।
मनुष्य विकास के दौड़ में अंधा हो चुका है उसे ना चिड़िया दिखाई देती है और ना ही चिड़िया का घोंसला।अब तो सालिम अली भी नही रहे जो इनकी भले के लिए सोचते थे। सुबह-सुबह चिड़ियों की चहचहाहट से सुंदर शायद ही कोई संगीत होगा प्रकृति की इस खूबसूरत देंन का हमे भी ख्याल रखना चाहिए और बिना रुके,थके,थमे और उत्साह से एक -एक तिनके को जोड़ घोंसला बनाती चिड़िया से हमे भी कभी हार ना मानने की शिक्षा लेनी चाहिए।
No comments:
Post a Comment