स्थान- दुर्ग ,छ.ग.
विधा- मुक्त, परिसंख्या अलंकार का प्रयोग
शीर्षक- जीवन दूसरों के वास्ते
जल में, थल में, नभ में
है सर्वत्र विद्यमान,
पर होता है सबसे अनमोल
अपना ही जीवन,
प्रेम,निर्भरता, लगाव, रिश्तों की परवाह के खातिर,
अपनों से बिछड़ जाने का
भय भी होता जीना ।
उनका अस्तित्व होता हमसे,
खुशियाँ होती,
और फिर अपनी खुशियाँ
लगती सदा बेमानी,
मनोरंजन, सैर-सपाटा,मस्ती
सब कर देते परे,
मायने रखती हैं उनकी हँसी-ठिठोली,मुस्कुराहटें।
जीना चाहते हैं हम उनके ही लिये क्योंकि,
ये जीवन हमारा,है उनके
जीवन का सहारा,
हमसे ही तो उज्जवल होंगे
उनके जीवन के रास्ते,
यही जीवन का महत्व है
जीना दूसरों के वास्ते।।
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